दैनिक जीवन में सुबह की तैयारी, काम, परिवार, भोजन, यात्रा और थकान जैसी साधारण बातें होती हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि आध्यात्मिकता इन सबसे अलग कोई चीज़ है, जबकि असली परीक्षा यहीं होती है। जब दिन केवल भागदौड़ और प्रतिक्रियाओं में बीतता है, तो मन बिखरा रहता है और सुकून कम मिलता है।
गीता 9.27 सिखाती है कि भोजन, दान, सेवा या काम, जो भी करो, उसे अर्पण भाव से करो, तब साधारण कर्म भी साधना बन जाता है। गीता 18.11 के अनुसार देहधारी कर्म पूरी तरह नहीं छोड़ सकता, इसलिए असली त्याग कर्मफल की आसक्ति छोड़ना है। गीता 4.21 में फल की आशा और संग्रह की प्रवृत्ति छोड़कर कर्तव्य करने वाला बंधन में नहीं पड़ता।
गीता 4.16 और 4.17 कर्म, अकर्म और विकर्म का विवेक करने को कहती हैं, यानी किसी काम को केवल बाहरी रूप से नहीं, उसके उद्देश्य और भावना से परखें। गीता 2.64 राग-द्वेष से मुक्त संतुलित भाव से विषयों का उपयोग करने की सीख देती है, और गीता 2.67 बताती है कि जिस इन्द्रिय के पीछे मन बह जाए, वही बुद्धि को दिशाहीन कर देती है। गीता 4.31 के अनुसार यज्ञभाव से जीना जीवन को सार्थक बनाता है।