प्रयास तुम्हारे हाथ में है; परिणाम में अनेक हाथ होते हैं।
भगवद्गीता के उद्धरण: जब दबाव बहुत अधिक लगे
511 उद्धरण – पढ़ें, मनन करें और साझा करें
भगवद्गीता से लिए गए उद्धरण 511 उद्धरण, हर एक अपने श्लोक से जुड़ा।
जब सब कुछ बहुत ज़्यादा लगे, एक समय में एक सही कार्य करने और अपने नियंत्रण से बाहर की बातें छोड़ने पर भगवद्गीता के उद्धरण पढ़ें।
सभी 511 उद्धरण
स्थिर मन न दुःख से कुचला जाता है, न सुख से बहा ले जाया जाता है।
शांति बस एक साँस की दूरी पर है।
शांति इस बोध से आती है कि तुम अकेले नहीं हो।
मनःस्थितियाँ मौसम हैं; सजगता आकाश है।
श्रद्धा वह स्थिर हाथ है जो भटकते मन को थाम लेती है।
अपना कर्म अर्पित कर दीजिए, वह बोझ नहीं रहेगा।
कछुए की तरह जानो कि भीतर कब समेटना है।
अपने सबसे व्यस्त घंटे के भीतर भी ठहराव खोजो।
स्थिर साँस, स्थिर मन।
उलझन एक पड़ाव है, निर्णय नहीं।
अपनी अवस्थाओं को देखो, उन्हें बन मत जाओ।
तुम बेचैन हो तब भी थामे हुए हो।
जुड़े रहो, उलझो मत।
अपनी चिंता ढीली होने दो: तुम इसे अकेले नहीं ढो रहे।
तुम किसी से कम प्रेम नहीं किए जाते।
जो भी शरण लेता है, उसका स्वागत है।
तुम अपने स्रोत से अलग नहीं हो।
अभिभूत होना लहर है, दीवार नहीं।
जब शांति दूर लगे, सहायता माँगो।
जब दिशा खो जाए, कृपा माँगो।
कोमल उपस्थिति एक क्षण में तुम्हें पुनः स्थिर कर सकती है।
उबरने की शुरुआत उसी क्षण होती है जब आप उस ओर मुड़ते हैं।
बेचैन मन असफल नहीं, केवल अप्रशिक्षित होता है।
तुम अपनी उत्पादकता से अधिक हो।
यदि तुम स्वयं को चोट पहुँचा रहे हो, सहायता के लिए संपर्क करो।
व्यस्त हाथ, शांत हृदय।
जब मन आगे भागे, साँस पर लौट आओ।
जीवन को शुद्ध करने के लिए उसे छोड़ना ज़रूरी नहीं।
संसार तुम्हारी इंद्रियों को छूता है; तुम्हारी शांति को छूना ज़रूरी नहीं।
कर्ता होने का बोझ छोड़ने से सुख मिलता है।
शोर का द्वार बंद करो, भीतर का कक्ष शांत हो जाता है।
करने की आसक्ति उतनी ही भारी है जितनी पाने की।
सबसे कठिन दिनों में अपने ही सहयोगी बनो।
विचारों को देखकर साधो, उनसे लड़कर नहीं।
जब तुम अपने चारों ओर ईश्वर देखते हो, तुम कभी त्यागे नहीं जाते।
संशय अकेले मत ढोओ; किसी विवेकी मित्र के साथ बाँटो।
अनेक छोटे कदम पर्याप्त हैं।
तुम उस सूत्र के मोती हो जो सबको थामे है।
ज़रा दूर से देखो, दिन की परेशानियाँ छोटी हो जाती हैं।
प्रेम करते रहो, स्पष्टता तुम्हें खोज लेगी।
हर विवरण को समझने की ज़रूरत छोड़ दो।
अभिभूत होने पर प्रार्थना स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।
ऐसे क्षण आते हैं जब साहस और शांति दोनों खो जाते हैं; वे लौट आते हैं।
जब सब कुछ बहुत अधिक लगे, दया माँगना ठीक है।
कहो: कृपया मेरे प्रति कोमल रहो।
सांत्वना माँगना कमज़ोरी नहीं, विवेक है।
शांति एक उपहार है जिसे तुम माँग सकते हो।
चीज़ें कैसे घटती हैं, इसके तुम अकेले लेखक नहीं।
समय सब कुछ आगे ले जाता है; पूरा भार स्वयं मत ढोओ।
तुम जिधर भी मुड़ो, उसी उपस्थिति का सामना करते हो।
एक साथ प्रसन्न और विचलित होना ठीक है।
जब विशाल बहुत अधिक हो, कोमल दृष्टि माँगो।
विशाल के बाद परिचित की चाह स्वाभाविक है।
जो जाना और प्रिय है, उसमें लौट आओ।
कोमल चेहरा देखना तुम्हें स्वयं तक लौटा सकता है।
चिंता के सागर का भी एक किनारा होता है।
तुम्हारी भावनाएँ क्षेत्र का मौसम हैं; तुम उन्हें देखने वाले हो।
तुम्हारे भीतर का परम स्व एक शांत, स्थिर मित्र है।
साक्षी तुम्हें कभी नहीं छोड़ता।
जो सबमें एक को देखता है, वह कभी अकेला नहीं।
आकाश जैसे बनो: तूफ़ानों को अपने भीतर से गुज़रने दो।
स्पष्टता, बेचैनी और सुस्ती मौसम हैं, पहचान नहीं।
जब सब कुछ भारी लगे, पहले स्वयं के प्रति कोमल रहो।
अपनी थकान को डाँटो मत; उसे सुनो।
जब मन अँधेरा और भारी हो जाए, प्रकाश और साथ माँगो।
यदि अँधेरा बना रहे, सहायता खोजो; तुम सहारे के योग्य हो।
तुम्हारे मूड के पार उन्हें देखने वाला है।
साक्षी मौसम नहीं है।
तुम्हें हर भीतरी हलचल पर प्रतिक्रिया देनी ज़रूरी नहीं।
उनके लिए भी आशा रखो जो खोए हुए लगते हैं।
स्वयं के प्रति कोमलता कमज़ोरी नहीं; विवेक है।
यदि तुम किसी साधना के कारण कष्ट पा रहे हो, सहायता लो।
हर बोझ उतारिए, शरण लीजिए, और शोक मत कीजिए।
जो इंद्रियों से भीतर आता है उसकी रखवाली करो, मन को शांति मिलेगी।
जो मन किसी पर भरोसा नहीं करता, उसके पास विश्राम की जगह नहीं।
इंद्रियों को अपना काम करने दो, तुम अपना केंद्र थामे रहो।
शरीर अपना काम करता रहे, तुम भीतर विश्राम करो।
शांति तुम्हारी सोच से अधिक निकट है।
'मेरा क्या लाभ' को छोड़ो, मन शांत होता दिखेगा।
सर्दी-गर्मी, प्रशंसा-निंदा में स्थिर रहो।
उस मन के प्रति कोमल रहो जो तुम्हारी अपेक्षा से अधिक चंचल है।
मनःस्थिति को अपनी पहचान मत समझो।
जाने जाने में विश्राम करो, तब भी जब तुम जान नहीं सकते।
समय हमारी कल्पना से विशाल है, और हमारी चिंताएँ उसमें छोटी हैं।
जीवन का बहुत भाग ज्वार है; कला है अच्छी तरह तैरना।
अपनी हर गति को घेरे हुए ठहराव पर भरोसा रखो।
अनासक्ति तुम्हें काम को घर ले जाए बिना काम करने देती है।
तुम्हें एक ही उपस्थिति देखती, आश्रय देती और थामती है।
अर्पित जीवन हल्का जीवन है।
विशालता पर निराश मत हो; उसमें आनंद लो।
पर्वत बिना शब्दों के स्थिरता सिखाता है।
सागर जैसे विशाल बनो, शांति से सब कुछ अपने में लेते हुए।
किसी वृक्ष के नीचे बैठो और अपने विचारों को विश्राम करने दो।
तुम उससे थामे हो जो केवल अंशतः दिखाई देता है।
अपार सौंदर्य को याद दिलाने दो कि तुम्हारी चिंताएँ कितनी छोटी हैं।
तब तक पीछे हटो जब तक टुकड़े एक पूर्ण न बन जाएँ।
सब प्राणी एक विशाल शरीर में विश्राम करते हैं; कोई छूटा नहीं।
अनंत का सामना बिना सब कुछ समझने की ज़रूरत के करो।
शाश्वत हर तूफ़ान के नीचे का शांत आश्रय है।
जब संसार बहुत बड़ा लगे, उसके लिए एक आशीर्वचन कहो।
खोया और हिला हुआ महसूस करना एक मानवीय क्षण है, स्थायी अवस्था नहीं।
सबसे बलवान भी शांत करने वाली उपस्थिति माँगते हैं।
कृपा की प्रार्थना 'सहायता' जितनी सरल हो सकती है।
साधन बनकर काम करो और परिणामों का भार उठ जाता है।
जब तुम अभिभूत हो, तुम्हारी आवाज़ काँपे तो ठीक है।
तुम्हें बड़ी बातों से हिलने की अनुमति है।
रुँधी आवाज़ भी कुछ सच कह सकती है।
भरोसा रखो कि जो तुमसे प्रेम करते हैं वे क्षमा करने को तैयार हैं।
विस्मय और भय एक ही हृदय में एक साथ रह सकते हैं।
तुम दर्शन से प्रेम कर सकते हो और फिर भी विश्राम माँग सकते हो।
अभिभूत होना परिचित कुछ माँगने का संकेत है।
जो भी तुम्हें अभिभूत करे, उसका कोमल रूप माँगो।
परिचित चेहरा सबसे बड़ा सहारा हो सकता है।
कोमल रूप की चाह में कोई लज्जा नहीं।
जब जीवन बहुत बड़ा लगे, अपनी कोमल दिनचर्या में लौट आओ।
सांत्वना एक वैध माँग है।
उलझन बीत जाती है; स्पष्टता धैर्यवान है।
सांत्वना आने पर संयम लौट आता है।
तुम पुनः स्थिर हो सकते हो; यह दुर्लभ नहीं।
सांत्वना को तुम्हें अपने मन तक लौटाने दो।
राहत वास्तविक है; उसे तुम्हें भिगोने दो।
शरण पलायन नहीं है; यह किसी अधिक स्थिर सत्ता से उधार ली गई शक्ति है।
किसी की राय को अपने आत्मसम्मान को बंधक मत बनाने दीजिए।
एकांत के लिए समय निकालो; मन को शांत स्थान चाहिए।
समय-समय पर भीड़ से हटो ताकि स्वयं को सुन सको।
भ्रम के अंधकार के पार एक स्थिर दीपक चमकता है।
गुण उठते और बीतते हैं; साक्षी रहता है।
सुख और दुःख तुम महसूस करते हो पर वे तुम्हें परिभाषित नहीं करते।
व्यस्त जीवन भी मुक्त जीवन हो सकते हैं।
स्व-देखभाल और दूसरों की देखभाल एक ही स्रोत से आती हैं।
व्यस्त जीवन के पीछे एक स्थिर और निर्मल स्वयं खड़ा है।
आकाश को बादल कभी हानि नहीं पहुँचाते।
तुम्हें एक विशाल, पोषण करने वाली प्रकृति थामे है।
विश्राम के बिना कर्म पिंजरा बन जाता है।
यदि भारीपन बना रहे, किसी ऐसे के पास पहुँचो जो मदद कर सके।
कोई मूड सदा नहीं रहता; दूसरा गुण उठेगा।
जब मन दौड़े, शरीर को विश्राम में लाओ।
गुणों के पार जाना उछाले जाना बंद करना है।
जब तुम हर मूड से अपनी पहचान नहीं जोड़ते, दुःख ढीला पड़ता है।
स्वयं में विश्राम करो और बाहर का मौसम कम मायने रखता है।
तुम्हारा हृदय उसमें विश्राम कर सकता है जो समाप्त नहीं होता।
सुख और दुःख दो वस्त्र हैं; आप उनमें से कोई नहीं।
जो चिंता कभी नहीं रुकती, वह गहरे सहारे की खोज का संकेत है।
यदि चिंता अंतहीन लगे, किसी भरोसेमंद व्यक्ति या विशेषज्ञ तक पहुँचो।
अपने चिंतित मन को टिकने के लिए कुछ स्थिर दो।
यदि तुम किसी चक्र में फँसे महसूस करो, संपर्क करो; चक्र तोड़े जा सकते हैं।
एक बार में एक विचार सुलझाओ।
उन ढर्रों के लिए सहायता खोजो जो अकेले सँभालने के लिए बहुत प्रबल लगें।
यदि तुम डूबता महसूस करो, ऐसी चीज़ थामो जो उठाए और ऐसे व्यक्ति से जुड़ो जो मदद कर सके।
मन को शांत करो, बाकी सब अधिक सहजता से आता है।
भीतर शांत रहो, बाहर शोर हो तब भी।
यदि कोई अनुशासन तुम्हें आहत करे, किसी भरोसेमंद मार्गदर्शक के साथ उस पर पुनर्विचार करो।
कम काम अधिक श्रद्धा से करो।
बाहर का कोलाहल भीतर की स्थिरता की परीक्षा है।
काँपता हुआ शरीर देखभाल माँग रहा है, दोष नहीं।
भार बहुत हो जाए तो बैठ जाना ठीक है।
गर्मी-सर्दी, सुख-दुःख: सब आगंतुक हैं, कोई स्थायी नहीं।
भय, क्रोध और मोह तीन गाँठें हैं; विवेक इन्हें ढीला करता है।
प्रयास परिणाम लाता है; विवेक ही विश्राम देता है।
संसार में सक्रिय रहो और केंद्र में अछूते।
हाथ काम करें और मन विश्राम करे।
सजगता भीतर लो; तनाव बाहर छोड़ो।
अपनी ज़िम्मेदारियों से प्रेम करो; वही तुम्हारी कक्षा हैं।
शांत मन वह काम करता है जो दूर चले जाने से नहीं होता।
इंद्रियाँ अपने विषयों से मिलती हैं; तुम्हें घसीटे जाने की ज़रूरत नहीं।
व्यस्त शरीर में भी तुम सहज रह सकते हो।
समचित्तता एक शांत विजय है।
जो मन अपने भीतर घर पा लेता है, वह कभी बेघर नहीं होता।
लय उसे सँवारती है जो जल्दबाज़ी बिगाड़ती है।
बेचैन मन अपना विश्राम-स्थान भीतर पाता है।
अपने बेचैन विचारों के धैर्यवान चरवाहे बनो।
मन शांत हो तो सुख निकट होता है।
संसार को एक देखने पर वह कम अकेला लगता है।
सीधे कहो: 'मैं अभी अपना मन स्थिर नहीं रख पाता'।
अशांत विचार दिशा की प्रतीक्षा करती ऊर्जा हैं।
सहारे के बिना मन बुरा ही सोचता है; सहारा खोजो।
तुम अपनी मनःस्थितियों को थामते हो; वे तुम्हें नहीं।
सहायता माँगो; यह पार जाना कभी अकेले के लिए नहीं बना।
जीवन के उस भाग के प्रति कोमल रहो जिसे तुम नियंत्रित नहीं कर सकते।
संसार को अदृश्य आलिंगन में तैरता देखो।
संसार की परवाह करो, पर उसमें डूबो मत।
तूफ़ान आकाश में है; आकाश तूफ़ान में नहीं।
विरामों के साथ शांत रहो; वे लय का हिस्सा हैं।
जो तुम माता-पिता में खोजते हो, वह पावन में पा सकते हो।
जो तुम अकेले सुरक्षित नहीं कर सकते, वह कृपा के रूप में मिल सकता है।
गर्माहट हर घर तक पहुँचती है; द्वार खोलो तो वह भीतर आती है।
संसार में पावन शक्ति को जानना हृदय को स्थिर करता है।
उससे जाने जाने में संतुष्ट रहो जिसे तुम पूरी तरह जान नहीं सकते।
जिसे तुम पूरी तरह समझ नहीं सकते, उसके साथ शांत रहो।
अलगाव केवल एक आभास है; जड़ साझी है।
कुछ दृश्य एक साथ समेटने के लिए बहुत बड़े हैं; अपना समय लो।
समय की ऊँचाई से देखने पर हमारे अनेक संघर्ष छोटे हो जाते हैं।
ब्रह्मांड उस पर टिका है जो कभी थकता नहीं।
ईमानदार रहो कि कब तुम्हारा एक दिन के लिए पर्याप्त विस्मय हो चुका है।
सांत्वना इसलिए दी जाती है कि तुम देखते रह सको।
सागर तैरने की ज़िद से नहीं, नाव मिल जाने से पार होता है।
जब प्रयास भारी लगे, शरण लीजिए और फल पर अपनी पकड़ ढीली कर दीजिए।
दुनिया के शोर को अपने भीतर का मौसम तय मत करने दीजिए।
अपनी शांति किसी और की स्वीकृति पर मत टाँगिए।
तुम जहाँ भी जाओ, तुम किसी ऐसे के भीतर हो जो तुम्हें घेरे है।
तुम जीवन में भाग ले सकते हो, उसमें बह जाए बिना।
जो देखता है, वह देखे जाने से कभी विचलित नहीं होता।
जब अहंकार हल्का हो तो ज़िम्मेदारी निभाना आसान होता है।
सबसे गंदा मौसम भी आकाश को अपरिवर्तित छोड़ता है।
भ्रम अकेलेपन में गाढ़ा होता है; संपर्क करो।
वर्षा में पहाड़ी की तरह निश्चिंत रहो।
जब मूड घूमें, दृढ़ खड़े रहो और डगमगाओ मत।
स्वयं में स्थित होना भीतर घर जैसा महसूस करना है, बाहर जो भी हो।
मूड झूलें तब भक्ति को वह रस्सी बनने दो जिसे तुम थामे रहते हो।
यदि सब कुछ खाली लगे, संपर्क करो; खालीपन हल्का किया जा सकता है।
उलझे विचारों से भरा मन स्वयं को फँसा सकता है।
देखो कि क्या तुम्हें अति-उत्तेजित करता है और कोमलता चुनो।
आप काम करते रहकर भी आश्रय में रह सकते हैं।
कभी-कभी मौन ही तुम्हारे पास एकमात्र ईमानदार उत्तर होता है।
उसे शालीनता से सह लो; वह रहने नहीं आया।
अपरिहार्य को स्वीकार करो; अपनी शक्ति उसके लिए बचाओ जिसे तुम बदल सकते हो।
परिणामों की चिंता प्रयास को ग़लत जगह ख़र्च कर देती है।
शांत पर्वत पर तो कोई भी ज्ञानी है; भीड़ भरी सड़क पर आज़माओ।
तुम संसार में रहकर भी स्वयं के रह सकते हो।
इंद्रियाँ सेवक हैं; उन्हें साधो, उनके आदेश मत मानो।
स्वयं में स्थित रहो, तुम्हारा काम तुम्हें हिला नहीं सकता।
जब मन डगमगाए, अभ्यास की शरण लो।
इस कहानी से मुक्त हो जाओ कि सब कुछ तुम ही करते हो।
स्थिर मन ऊँचाई और निचाई, दोनों की सवारी करता है।
काम से मुक्त होने के लिए उसे छोड़ना ज़रूरी नहीं।
अपनी ही चालों में व्यस्त मन विश्राम नहीं पा सकता।
तुम जो हो उसमें विश्राम करो; बाकी प्रतीक्षा कर सकता है।
सहारा माँगो; साधना अकेले चलने के लिए नहीं बनी।
जब संसार शोरगुल भरा हो, इंद्रियों को कोमलता से भीतर समेट लो।
जो स्थिर है उसकी शरण लो और वहीं से सीखो।
घंटे की मनःस्थिति को तुम्हारी पूर्ण पहचान मत बनने दो।
संसार की भूलभुलैया अकेले पार करना कठिन है।
कुछ नदियाँ सहायता से ही पार होती हैं।
एक ऐसा स्थान है जहाँ से कोई भेजा नहीं जाता।
समझ तुम्हें बह जाने से बचाती है।
जब संसार चक्र जैसा लगे तो सरल श्रद्धा पर लौटो।
अपनी असहायता के साथ करुणा और जिज्ञासा से पेश आओ।
पाने और खर्च करने का चक्र थकाता है; विश्राम खोजो।
पूर्ण की महानता समझना छोटी परेशानियों को छोटा कर देता है।
जो उभरकर दिखे उससे शुरू करो; बाकी पीछे आएगा।
अपने विचारों को पक्षी की तरह भीड़ से ऊपर उड़ने दो।
अनंत और सर्वत्र: अपनापन महसूस करने का निमंत्रण।
समय अग्नि जैसा लग सकता है; उसकी तपन से आश्रय माँगो।
आँसू और कंपन उस हृदय के चिह्न हैं जो जीवन को गंभीरता से ले रहा है।
कर्म अर्पित कीजिए और अपनी शांति बचा लीजिए।
व्यथित न होना उदासीन होना नहीं; अडिग होना है।
मुँह फेरे बिना पीड़ा को देखो; जानो कि वह क्या सिखाती है।
व्यस्त कर्ता के भीतर के अनुभवकर्ता की देखभाल करो।
कभी-कभी कर्ता का सबसे अच्छा काम अनुभवकर्ता को विश्राम करने देना है।
चिंता तब बढ़ती है जब हम मानते हैं कि बस यही क्षण सब कुछ है।
पावन के बोध के बिना हृदय डूब सकता है।
जानो कि क्या तुम्हें उद्विग्न करता है, फिर देखभाल से उसे सँभालो।
लालसा से चलने वाला कर्म जल्दी बुझ जाता है।
आप चक्र पर अकेले नहीं हैं।
ऊँचे संकेतों से भरे संसार को एक शांत केंद्र चाहिए।
जब हृदय अभिभूत होता है, तो शरीर पहले बोलता है।
जब खड़ा न रहा जाए, तो बैठिए और साँस लीजिए।
अपने औज़ार नीचे रख देना विराम है, अंत नहीं।
तुम अभी जो भी महसूस करते हो, वह आया है और चला जाएगा।
तुम्हारा एक अंश ऐसा है जहाँ कोई तूफ़ान नहीं पहुँचता।
सूचना सिर भरती है; स्थिरता उसे ठहराती है।
अच्छी कील तूफ़ान नहीं रोकती; वह जहाज़ को सीधा रखती है।
अपने कामों से ऐसे गुज़रो जैसे खुली हथेलियों से जल।
अपनी बेचैनी को किसी गहरे उद्देश्य को सौंप दो।
स्वयं को भीतर लंगर दो; फिर संसार चारों ओर बहता रहेगा।
अपने स्वामित्व को हल्का करके कर्मों को हल्का करो।
प्रशंसा और निंदा में सम रहने पर तुम्हें कोई इधर-उधर नहीं धकेल सकता।
अपनी योजनाएँ किसी बड़े उद्देश्य को सौंपो और उन्हें हल्का होते देखो।
शोर से तब तक हटो जब तक अपनी आवाज़ न सुन लो।
अपनी शंकाएँ गुरु के पास ले जाओ, निराशा के पास नहीं।
सुख और दुःख अतिथि हैं, मकान-मालिक नहीं।
जान लो कि तुम्हें भी उसी सजगता से जाना जाता है जिससे बाकी सबको।
जब तुम लोभी और जल्दबाज़ी में हो, रजस ऊँचा है; धीमे हो जाओ।
आप परम की पहुँच से कभी बाहर नहीं हैं।
कठिन होने के कारण कर्तव्य से बचने पर शांति नहीं मिलती।
काम को अपने भीतर से गुज़रने दीजिए; चिपकने मत दीजिए।
आपको अकेले पार नहीं करना है।
जीवन चक्र जैसा लग सकता है; उसे याद रखिए जो उसके केंद्र में खड़ा है।
आपकी उपस्थिति कहे, ‘हम आपके साथ हैं।’
जब सब कुछ शोरभरा हो, तब अपनी साँस सुनिए।
भारी हृदय एक सूचना है, कोई त्रुटि नहीं।
जब मन अभिभूत हो, तब एक मार्गदर्शक और एक शांत आसन खोजिए।
असुविधा संदेशवाहक है, निवासी नहीं।
अचल की तरह बनो: घटनाओं को गुज़रने दो, स्वयं मत हिलो।
शांति को निश्चितता की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।
जहाँ अपेक्षा घटती है, वहाँ पीड़ा भी पतली पड़ती है।
जीवन के शांत होने की प्रतीक्षा मत करो; व्यस्त रहते हुए ही शांति का अभ्यास करो।
संशय के समय पूछिए: अभी मैं एक कौन-सी बात कर सकता हूँ?
अपनी शांति किसी की स्वीकृति से मत बाँधिए।
शांति से काम कीजिए; परिणाम ढोना आपके हिस्से का नहीं।
अपने जीवन में हल्के बैठो; वह तुम्हारे प्रयास से अधिक पर चलता है।
दुःख आ सकता है; स्थिरता मेज़बान बनी रहती है।
बेचैन संसार के पीछे कुछ शांत और शाश्वत विराजमान है।
पीड़ा सूचना है, छोड़ देने का आदेश नहीं।
जब अहं चलाता है, तब प्रयास तनाव बन जाता है।
जब शोर शुरू होता है, तो वह शायद ही अपनी घोषणा करता है।
अभिभूत होना मानवीय है; उसे नाम देना पहला कदम है।
जब शरीर रुकने को कहे, तब रुक जाना ठीक है।
जब मन घूमता है, तब जाना-पहचाना साधन भी हाथ से फिसल जाता है।
ईमानदार निराशा पहली ईमानदार बातचीत है।
निराशा का मौसम प्रश्नों का मौसम बन सकता है।
हृदय भरा हो सकता है, और मन फिर भी कर्म के लिए तैयार नहीं।
बाहरी जीत भीतरी थकान को नहीं भर सकती।
अच्छे गुरु तुम्हारी उथल-पुथल के बीच तुमसे मिलते हैं।
जब वर्तमान अंतिम लगे, तब लंबी दृष्टि याद रखो।
जब परिस्थितियाँ जलाएँ, तब याद रखो कि क्या अदग्ध रहता है।
सुख और दुःख के बीच एक शांत जगह है; वहाँ खड़ा होना सीखो।
स्वयं में जड़ें जमाओ, और संसार के झूले तुम्हारे ऊपर से गुज़र जाएँगे।
जो मन भीतर लौट सकता है, उसे भीड़ पूरी तरह बाहर नहीं कर सकती।
तुम्हें संसार से भागना नहीं है, बस उसके खींचने से बचना है।
निर्णायक उत्तर बेचैन मन को शांत करता है।
जीवन की मशीनरी को बिना उसमें फँसे देखिए।
तुम दिन भर कर्म करके भी बंधन-मुक्त रह सकते हो।
साँस धीमी करो, तो दिन भी धीमा हो जाता है।
पुराना संशय आज और कल दोनों चुरा लेता है।
किसी भी कार्य का असली बोझ संशय है।
हृदय की शुद्धता व्यस्त जीवन को हल्का कर देती है।
सबसे व्यस्त जल में भी अछूते रहकर तैरते रहो।
चिंता के झोंके शांत करो और देखो तुम्हारी एकाग्रता कैसे चमकती है।
इस विचार में विश्राम करो कि सच्चा काम पुरस्कृत होता है।
संसार को अपने आप चलने के लिए नहीं छोड़ा गया।
यदि तुम अभिभूत महसूस करो, किसी भरोसेमंद व्यक्ति तक पहुँचो।
जहाँ भक्ति गहरी होती है, वहाँ चिंता ढीली पड़ती है।
जिसे आप समभाव से सह लेते हैं, उसे अच्छी तरह सह लेते हैं।
भोजन और विचार, दोनों में उतना ही लीजिए जितना सचमुच पच सके।
आवश्यकता हो तो विश्राम कीजिए, पर थकान को ज्ञानोदय मत कहिए।
भारी प्रयास अच्छा प्रयास नहीं होता।
परिणामों की उत्कट चाह कर्ता को बेचैन कर देती है।
अंधकार से निकलने का पहला कदम उसके निर्णयों पर संदेह करना है।
मन उस पर रखिए जो मायने रखता है; बाकी स्वयं सुलझता जाता है।
जब संसार आपको घुमाता लगे, तब याद रखिए कि भीतर कौन बैठा है।
प्रतिद्वंद्वियों की सूची चुपचाप चिंताओं की सूची बन सकती है।
साझा ज़िम्मेदारी अकेली ज़िम्मेदारी से हल्की होती है।
हर तेज़ आवाज़ आपात नहीं होती।
जितने अधिक स्वर जुड़ते हैं, किसी एक को उतना कम अकेले उठाना पड़ता है।
भीतर की शांति संसार के शोर को सहने योग्य बनाती है।
अपने शरीर के संकेतों को बिना आलोचना के सुनिए।
जिसे आपका शरीर आपसे देखने को कह रहा है, उसे अनदेखा करके मत चलिए।
पकड़ का छूटना सदा विफलता नहीं; कभी वह विश्राम का संकेत होता है।
भ्रम मन का शांति के लिए अनुरोध है।
जब आप अपने बल पर खड़े न रह सकें, तब सहायता माँगिए।
आपको हर समय सब कुछ सँभालकर रखना ज़रूरी नहीं।
सबसे बलवान योद्धा के सामने भी वह क्षण आता है जब आँखें भर आती हैं।
अपनी व्यथा को ईमानदारी से नाम दो; सहायता की ओर यह पहला क़दम है।
जो आज अंतहीन लगता है, वह जल्द ही स्मृति बन जाएगा।
तुम अपनी चिंताओं से पुराने हो।
लोग तुम्हें अपने शब्दों में समझाएँगे; तुम्हें अपना सत्य स्वयं जानना होगा।
भीतरी अभ्यास के कुछ मिनट एक विशाल चिंता को छोटा कर सकते हैं।
बहुत सारे लक्ष्य अंततः कोई लक्ष्य नहीं रह जाते।
बिखरा प्रयास थकाता है; एकाग्र प्रयास शांत करता है।
कई आवाज़ें खींचती हैं; स्थिर मन टिका रहता है।
सोच में डूबा छोड़ा गया मन अपना तूफ़ान स्वयं बना लेता है।
जो शांति छिपती है, वह नाज़ुक है; जो भीड़ के बीच चलती है, वह टिकती है।
उलझन विफलता नहीं; सरल करने का संकेत है।
शांति पाने के लिए आप जीवन से बाहर नहीं जा सकते; उसे जीवन के भीतर पाइए।
हल्के से थामा गया कर्तव्य आपको ऊपर उठाता है।
आसक्ति-रहित कार्य चिंता-रहित कार्य है।
अंतर्दृष्टि आपको हर लहर को व्यक्तिगत लेने से मुक्त करती है।
स्पष्टता अक्सर मौजूद होती है, बस ढकी होती है।
स्थिर मन अपने स्थान से हिले बिना पर्वत हिला सकता है।
सबसे शीघ्र मिलने वाली शांति वही है जो किसी परिणाम से बँधी नहीं।
इस सत्य से मेल बैठा लीजिए कि कर्म कभी समाप्त नहीं होता।
आपका प्रयास एक बड़े ताने-बाने का एक धागा है।
धीमे होइए; शांति के बिना महत्वाकांक्षा शोर है।
जब उदासी जाने से इनकार करे, तब सहायता लीजिए।
पुनः ताज़ा होने के लिए विश्राम कीजिए, भागने के लिए नहीं।
जहाँ कुछ जकड़ा नहीं है, वहाँ कर्म हल्का है।
अपनी दिनचर्या से अधिक स्थिर किसी चीज़ की शरण लीजिए।
अपना भार उस पर टिकाइए जो उसे थाम सके।
चिंता को ख़तरों की तालिका बहुत प्रिय है।
स्वयं को वास्तविक परिस्थिति के सामने रखिए, कल्पित के नहीं।
तनाव हाथों, गले और साँस में दिखाई देता है।
जब तनाव शरीर पर हावी हो जाए, तब सहारा लीजिए।
एक उचित प्रश्न गिरते चक्र को रोक सकता है।
पाने और बचाए रखने की चिंता सबसे थकाने वाला काम है।
अशांत मन अच्छे दिनों को भी चिंता में बदल देता है।
आप किस भाव से कर्म करते हैं, वही तय करता है कि कर्म आप पर बोझ बनेगा या नहीं।
ज़िम्मेदारी के बीच भी पूर्णता संभव है।
प्रकृति का खेल देखिए; उसे व्यक्तिगत मत बनाइए।
ज्वर वह है जो हम काम में जोड़ते हैं; काम स्वयं स्वच्छ है।
संसार से भागने से मन मुक्त नहीं होता।
अपनी आँखों को विश्राम का स्थान दो।
प्रतिरोध से नहीं, स्मरण से पार उतरिए।
हर शाखा का बढ़ना ज़रूरी नहीं; कुछ की छँटाई ज़रूरी है।
शांत मन शरीर को उसका शांत कार्य करने में सहायता देता है।
भूलना भी इस व्यवस्था में अपना स्थान रखता है।
पूछिए कि आपकी कौन-सी चिंताएँ नश्वर हैं।
मोह का कोहरा कर्तव्य को शत्रु जैसा दिखा देता है।
कार्य कीजिए; कार्य के बारे में बनी कहानी छोड़िए।
इच्छा प्रयास को ईंधन देती है, पर उसे चिंता से भी भर देती है।
जब सब कुछ गलत दिखे, तब अपना प्रकाश जाँचिए।
सर्वोच्च पर टिका मन विवरणों में शायद ही खोता है।
अभिमान इसे महँगा बनाए, उससे पहले सहायता माँग लीजिए।
जो घबराया हो उसे सँभालिए; हो सकता है वह हम सबका बोझ उठा रहा हो।
सहारा उन जगहों से आता है जिनकी आपने अपेक्षा नहीं की थी।
निभाया गया कर्तव्य टाले गए कर्तव्य से हल्का होता है।
थका नेता भी सिखाता है, इसलिए समझदारी से विश्राम कीजिए और लौटिए।
दिव्य कर्म को समझने से अपना कर्म हल्का हो जाता है।
सफलता के पीछे हो? देखो कि यह तुम्हारी शांति से क्या लेती है।
जलाने का काम ज्ञान को करने दो, ताकि तुम्हें ढोना न पड़े।
प्रकृति की लय तुम्हें तुम्हारे धक्के से अधिक दूर ले जाती है।
हर मिलने वाली उथल-पुथल को अपने भीतर मत उतारिए।
शाखाओं का उलझाव उद्देश्य नहीं होता।
थकान आपके उद्देश्य को जाँचने का संकेत है।
विश्राम, पोषण और संगति धुँधले मन को उठा सकते हैं।
दुःख प्रयास से बचने से नहीं, सही प्रयास खोजने से समाप्त होता है।
लक्ष्य जटिलता के संकेत से अधिक निकट है।
आश्रित हृदय किसी भी कार्यभार का सामना कर सकता है।
स्थिर बिंदु को देखने पर चक्कर कम हो जाता है।
जो आपका बोझ बाँटते हैं, उनके साथ जो आप देखते हैं, साझा कीजिए।
हाथ काँप रहा हो तो साधन अधिक मायने नहीं रखते।
अपने प्रियजनों के नाम लेना आपके अनुपात-बोध को लौटा सकता है।
विश्राम भी एक प्रकार का कर्म है; उसे भी अच्छी तरह कीजिए।
सुस्त मन उन्हीं पर अविश्वास करता है जो सहायता कर सकते हैं।
गहरे मार्ग पर हड़बड़ी मत करो।
आज के प्रति कोमल रहो; तुम इससे कहीं पुराने हो।
संसार में ऐसे रहो जैसे जल पर कमल का पत्ता।
जो भी तुम्हें यहाँ लाया हो, तुम्हारा स्वागत है।
शांति उसके पीछे चलती है जो फल की आसक्ति छोड़ देता है।
तुम पूरी तरह कर्म करके भी कर्तापन से अलग रह सकते हो।
बंधन छोड़ने के लिए संसार छोड़ना ज़रूरी नहीं।
छोटे से शुरू करो: एक अक्षर, एक कदम, एक साँस।
विशाल के आगे छोटा महसूस करने में तुम अकेले नहीं हो।
साँस लो; काँपना बीत जाएगा।
दुःख को मौसम की तरह गुज़रने दो, किरायेदार की तरह बसने मत दो।
आत्मस्थ व्यक्ति कर्म करता है पर कर्म से अधिकृत नहीं होता।
संतुलित दिन चुपचाप दुःख को हल्का करता है।
अपने संशय को स्पष्ट नाम दो, उसका आधा घुल जाता है।
सांत्वना लो: सब कुछ बीतने वाला नहीं है।
अपना मन उसे दो जो तुम्हें थामता है।
ईश्वर में टिका मन बाढ़ में बहता नहीं।
जब जीवन से मैला महसूस करो, भीतर के आकाश में लौटो।
तुलना शांति की चोर है।
पुरस्कार मौसम की तरह बदलते हैं; विवेक छत की तरह टिका रहता है।
जिस भी फल को तुम थामना छोड़ते हो, वह तुम्हारी शांति को थोड़ी और जगह देता है।
भ्रम एक झाड़ी है जिसे पार करना है, घर नहीं बनाना।
पहले शांति आती है; स्पष्ट सोच उसके पीछे-पीछे आती है।
अपना ध्यान भीतर मोड़ो और साँस को स्थिर करो।
दिशा न मिले तो करुणा भी अभिभूत कर सकती है।
अपने कर्म अर्पित कीजिए और बिना ज्वर के कर्म कीजिए।
जो संशय बोला जाता है, वही स्पष्टता का आरंभ बन सकता है।
अधिकार-भाव सबसे भारी बोझ है जिसे हम ढोते हैं।
अकेले बिताए कुछ शांत मिनट पूरा दिन फिर से तय कर सकते हैं।
स्थिर विश्वास से बड़ा कोई तूफ़ान नहीं।
जब हर उपाय थक जाए, तब भी एक आश्रय शेष रहता है।
बेचैन कमरे में शांत उपस्थिति बनिए।
जब आपके अपने नक्शे छोटे पड़ जाएँ, तब शरण ही उचित उत्तर है।
आप जितना जानते हैं, उससे अधिक थामे हुए हैं।
जो ब्रह्मांड को सँभालता है, वही आपको भी सँभालता है।
एकांत के लिए स्थान बनाइए; मन वहाँ विश्राम पाता है।
चिंता परिणाम पूछती है; विवेक कर्तव्य पूछता है।
जो मन स्वयं में ठहरा है, उसे बाहर की कोई चीज़ विचलित नहीं कर सकती।
शांत मन में दुःख की ज़मीन खिसक जाती है।
स्वतंत्रता पलायन में नहीं मिलती।
सुख-दुःख के जोड़ों से ऊपर उठो।
हृदय थका हो तो हाथों को सेवा करने दीजिए।
भीतर से आने वाले आनंद पर परिस्थिति कर नहीं लगा सकती।
जिसे ढोने के लिए आप नहीं बने, उसे ढोना बंद कीजिए।
मनोबल संक्रामक होता है; शांति भी।
जब शरीर काँपे, तब साँस धीमी कीजिए और पाँव स्थिर कीजिए।
घबराहट का सबसे अच्छा उत्तर एक शांत स्वर है।
बहुत-सी शिक्षाएँ उसी मन को बिखेर सकती हैं जिसे वे स्थिर करने आई थीं।
घटनाओं को जैसी हैं वैसी रहने दो; उन पर अतिरिक्त पसंद-नापसंद मत चढ़ाओ।
हर विचार सोचने वाले पर एक छाप छोड़ जाता है।
थकान या उदासी के साथ आई निश्चितता से सावधान रहिए।
अपने मनोभावों पर लज्जित मत हों; उनके प्रतिरूप सीखिए।
जब हर उपाय आज़माया जा चुका हो, तब भरोसा शेष रहता है।
पहले ज़मीन स्थिर कीजिए, फिर अगला कदम तय कीजिए।
जब भावना मन को डुबो दे, तो कर्म से पहले मार्गदर्शन माँगो।
शब्दों के तूफ़ान के बाद मौन मार्गदर्शन के लिए जगह बनाता है।
स्थिर आत्मा एक बेचैन जीवन का शांत केंद्र है।
तुम जीवन को जैसे भी समझो, उसे शांति से मिलने का एक मार्ग है।
आलोचना ऊँची और निर्मम हो सकती है; अपना केंद्र बनाए रखो।
काम ऐसे करो मानो परिणाम पहले ही स्वीकार हो चुका हो।
आप अपने आवेगों से अधिक हैं और अपने विचारों से भी अधिक।
स्वयं को उसमें लंगर डालिए जो नहीं बदलता।
रोज़ थोड़ी देर शोर से हट जाओ।
सोच को ठहराइए, जीवन उसके पीछे चल पड़ेगा।
स्थिर मन वही छोड़ पाता है जो उसके वश में नहीं।
आज में संतुष्ट रहिए, ताकि कल आपको बंधक न बना सके।
आपदाओं का अभ्यास छोड़ते ही चिंता क्षीण होने लगती है।
शरीर को चलना है; मन ठहरा रह सकता है।
निराश मन हर कार्य को बहुत भारी देखता है।
शांति वह है जो हृदय तब महसूस करता है जब वह स्वयं की रक्षा करना बंद कर देता है।
शांति वहाँ आरंभ होती है जहाँ नियंत्रण की कोशिश समाप्त होती है।
पूछो कि तुम्हारा दुःख वास्तव में किससे मिटेगा, केवल किससे बहलेगा नहीं।
उस क्षण को सहो, पर उसे अपनी पहचान मत बनाओ।
यदि जीवन नदी है, तो तैरना सीखो, लड़ना नहीं।
स्वयं में विश्राम करो और पीछा करना चुपचाप थम जाता है।
भक्ति को वह एक स्थान बनने दीजिए जहाँ आप बेचैन नहीं होते।
तात्कालिकता को विवेक पर चिल्लाने मत दीजिए।
चलाए जाना खो जाना नहीं है।
देखिए दबाव आने पर आपकी पहली प्रवृत्ति क्या होती है।
घूमता मन अच्छा निर्णय नहीं कर सकता; उसे टिकने का समय दीजिए।
उस पकड़ को छोड़ दीजिए जिसे थकान पहले ही ढीला कर चुकी है।
परीक्षा की घड़ी पहले स्थिरता माँगती है, स्पष्टीकरण बाद में।
मुस्कान कह सकती है: रास्ता है।
तुम किस अवसर को समस्या कहते रहे हो?
मौन वह कवच है जिसमें मन स्वस्थ होता है।
अभी जो तुम कर रहे हो, उसमें ठहराव कहाँ है?
शांति इसे देखने से आती है कि मनोभाव और कर्म प्रक्रियाएँ हैं।
जब सब कुछ बहुत बड़ा लगे, तुम्हें स्थिर करने में क्या मदद करता है?
स्रोत को याद करने पर अकेलापन कोमल पड़ जाता है।
उलझन को जब गुरु के पास ले जाओ, वह सीख बन जाती है।
अभी तुम्हारा मन मित्र की तरह व्यवहार कर रहा है या शत्रु की?
कौन-सी चिंता छोटी हो जाएगी यदि तुम उसे हज़ार वर्षों के पार से देखो?
तुम्हारे बेचैन दिन में कहाँ तुम आकाश को अपने को थामे महसूस कर सकते हो?
रात का मौन भी जो बढ़ रहा है, उसे पोषित करता है।
जब चिंता तेज़ हो, तब कौन-सी स्थिर चीज़ तुम्हारी मदद करती है?
अपनी प्रकृति के स्वामी बनो, फिर संसार तुम्हें बाँध नहीं सकता।
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