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भगवद्गीता के उद्धरण: व्यक्तिगत विकास
1579 उद्धरण – पढ़ें, मनन करें और साझा करें
भगवद्गीता से लिए गए उद्धरण 1579 उद्धरण, हर एक अपने श्लोक से जुड़ा।
व्यक्तिगत विकास पर भगवद्गीता के उद्धरण खोजें, जो ज्ञान, प्रयास और अनुशासन के सहारे आत्म-सुधार, आंतरिक शक्ति और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
सभी 1579 उद्धरण
झुको, पूछो और सेवा करो: ज्ञान के तीन द्वार।
जब तुम किसी ढर्रे को सच में देख लेते हो, तो वह पहले जैसा नहीं बाँधता।
स्वयं को उठाओ; स्वयं को गिरने मत दो।
लौटना ही साधना है।
शून्य से नहीं, वहीं से फिर शुरू करो जहाँ छोड़ा था।
जो सीखो, उसे जियो।
तुम्हारा सबसे बुरा दिन तुम्हें परिभाषित नहीं करता; तुम्हारा संकल्प कर सकता है।
इस योग में स्वयं को लगाओ: तुम जैसे काम करते हो, वैसे ही बनते जाते हो।
अनुशासन को आत्म-दंड मत बनाओ।
मन को साधा जा सकता है, एक-एक दोहराव से।
हर सच्चा कदम ऐसा निशान छोड़ता है जो मिटता नहीं।
यदि तुम विवेक में जन्मे नहीं, तब भी उसे बना सकते हो।
जो तुमने सीखा है, वह तुम्हें पूरी तरह कभी नहीं छोड़ता।
समझने की चाह ही प्रगति है।
ज्ञान नक्शा है; अभ्यास चलना।
तुम जो खोजते हो, वही तय करता है कि तुम कहाँ पहुँचते हो।
हर समय स्थिर रहो, केवल आसान समय में नहीं।
तुम वही बनते हो जिसकी तुम उपासना करते हो।
हृदय बदलने में कभी देर नहीं होती।
तुम्हारा मोल इससे तय नहीं होता कि तुमने कहाँ से शुरू किया।
अनुशासन के नाम पर स्वयं को चोट मत पहुँचाओ।
उठो: जो दुर्बलता तुम्हें रोक रही है, वह लगती है उससे छोटी है।
‘मैं उलझन में हूँ’ कह दो, और सीखना शुरू हो सकता है।
पूर्णता नहीं, कुशलता का अभ्यास करो।
यह मत पूछो कि विवेक क्या है, यह भी पूछो कि वह कैसे चलता है।
हर योजना से पूछो: यह किसकी चाह है?
अपनी बिखरी ऊर्जा को एक स्थिर लौ में समेट लो।
सबसे कठिन दिनों में अपने ही सहयोगी बनो।
तुम्हारा सबसे बुरा विरोधी और सबसे अच्छा सहयोगी एक ही सिर में रहते हैं।
साधना संतुलन में फलती है, अति में नहीं।
शांति बगीचे की तरह उगाई जाती है।
कौशल कभी न भटकने में नहीं, लौट आने में है।
कठिन का अर्थ असंभव नहीं।
केवल कठिन नहीं, समझदारी से प्रयास करो।
अपना प्रयास फिर शुरू करो; तुम्हारा अतीत तुम्हारे पक्ष में है।
इच्छाशक्ति कम हो तब भी पिछला अभ्यास तुम्हें आगे ले जाता है।
पूर्णता अनेक छोटे, ईमानदार प्रयासों का काम है।
अनेक छोटे कदम पर्याप्त हैं।
केवल कलाकार नहीं, साधक बनो।
खोज शुरू करने का कोई गलत कारण नहीं होता।
अंत में स्थिर मन स्थिर दिनों से बनता है।
तुम जिस ओर मुड़ते हो, वही बन जाते हो।
तुम प्रकाश का मार्ग चुनने के लिए स्वतंत्र हो।
जिस क्षण तुम सही करने का संकल्प लेते हो, तुम सही चलने लगते हो।
भलाई की ओर मुड़ो, भलाई तुम्हारी ओर मुड़ेगी।
अहिंसा, समता, संतोष और दान: इन्हें इकट्ठा करो, तुम धनी हो।
पुराने वृक्ष की तरह बनो: जड़ वाले, उदार, बिना जल्दबाज़ी के।
संसार के बारे में सीखना अच्छा है; स्वयं के बारे में सीखना बेहतर।
हर चीज़ पहले अक्षर से शुरू होती है; शुरू करो।
छोटे से शुरू करो: एक अक्षर, एक कदम, एक साँस।
अपने जीवन को अपनी ही ऋतु में खिलने दो।
भलाई अच्छे लोगों की शांत दीप्ति है।
सीखने को सदा और होगा, और यह एक आनंद है।
सफलता तुम्हें कृतज्ञ बनाए, अभिमानी नहीं।
नई चीज़ें नहीं, नई आँखें माँगो।
महानता जानती है कि कोमल कैसे बना जाता है।
जिसे तुम प्रेम करते हो, उसमें पूरे हृदय से रहो।
कम बोलिए, आपके शब्दों का वज़न बढ़ जाएगा।
हम जो बार-बार करते हैं, वही हम बन जाते हैं।
स्वतंत्रता जो चाहो वह करना नहीं; विवेक से चाहना है।
तुम उससे आकार लेते हो जिसे तुम प्रिय मानते हो।
जो अनुशासन तुम्हें चोट पहुँचाए, वह विवेक नहीं।
यदि कोई साधना तुम्हें हानि पहुँचाए, उसे बदलो।
अपने शरीर की देखभाल अपनी आत्मा की देखभाल का एक तरीका है।
जो साधना तुम्हें या दूसरे को हानि पहुँचाए, वह राह भटक गई है।
सच्ची शक्ति स्वयं के प्रति कोमल होती है।
सच्चे बनो, और भले बनो।
भला करते रहो, बार-बार।
तुम जो स्थिरता से करते हो, वही तुम बन जाते हो।
एक स्पष्ट उद्देश्य हज़ार बिखरी इच्छाओं से अधिक बलवान है।
जिज्ञासा पूछती है, अहंकार जानने का दिखावा करता है।
हर आवेग को सचेत चुनाव बना लो।
हर कार्य को कुछ सिखाने दो।
सीखना विनम्रता से शुरू होता है और प्रश्नों से बढ़ता है।
समझ पुराने ढर्रों को सूखी लकड़ी की तरह जला देती है।
उठो, अभ्यास में स्वयं को स्थिर करो, और आरंभ करो।
यह पूछो कि तुम्हारे लिए सबसे हितकारी क्या है, यह नहीं कि सबसे श्रेष्ठ क्या सुनाई देता है।
अपने अध्ययन को सेवा बनने दो, और सेवा को अध्ययन।
शांत, निर्भय और अपने व्रतों में स्थिर रहो।
निरंतरता से शांति चरित्र बन जाती है।
अपने ध्यान को विचलन की हवाओं से बचाओ।
दृढ़ संकल्प और आशावान हृदय के साथ अभ्यास करो।
रोज़ अभ्यास करो, आनंद सहज हो जाता है।
संघर्ष प्रयास के पदचिह्न हैं।
निरंतरता उसे साध लेती है जो बल नहीं साध पाता।
तुम फटा हुआ बादल नहीं, बनता हुआ बादल हो।
विनम्रता पूछती है; अहंकार मान लेता है।
भलाई की ओर प्रयास हर असफलता से अधिक टिकता है।
कौशल सोता है; मरता नहीं।
आदत वह नदी है जो थकने पर तुम्हें बहा ले जाती है।
धैर्यपूर्ण, स्थिर प्रयास सर्वोच्च लक्ष्य तक पहुँचता है।
चलते रहो; गंतव्य जल्दी नहीं करता।
बिना हड़बड़ी के डटे रहो, लक्ष्य निकट आता है।
दिखने से अधिक होने को चुनो।
पूरा जानने के लिए पूरा ध्यान दो।
तब तक सीखो जब तक जो जानते हो और जो जीते हो एक न हो जाए।
अधिकांश पहले उत्तर पर रुक जाते हैं; साधक पूछते रहते हैं।
हर मन में समझ का बीज है।
जहाँ हो वहीं से शुरू करो: परेशान, जिज्ञासु, इच्छुक या विवेकी।
अपने धीमे पकने के प्रति धैर्य रखो।
देखो कि तुम्हारी आदतें किसकी पूजा कर रही हैं।
ऐसा लक्ष्य चुनो जो तुम्हारे पूरे जीवन को थाम सके।
हमारा ज्ञान एक खिड़की है; पूरा आकाश उससे बड़ा है।
विनम्रता वहाँ से शुरू होती है जहाँ हम जानते हैं कि पूर्ण का कितना कम हम जानते हैं।
दृढ़ संकल्प अनेक छोटे सही कर्मों से बनता है।
स्पष्ट रहो, दयालु रहो, प्रतिबद्ध रहो।
स्पष्टता साफ परिभाषाओं से शुरू होती है।
विद्यार्थी का सबसे अच्छा औज़ार एक सटीक प्रश्न है।
तुम्हारा अपना स्वभाव परम का द्वार है।
तुम जिस पर टिके रहते हो, उसी की ओर बढ़ते हो।
विचलन के द्वार एक-एक करके बंद करो।
स्थिर स्मरण प्रयास को सहजता में बदल देता है।
हर दिन ऐसे शुरू करो जैसे संसार अभी रचा गया हो।
चक्र दोहराते हैं; विवेक बदलता है कि हम उनसे कैसे मिलें।
जब तक नया मार्ग न चुना जाए, ढर्रे दोहराते रहते हैं।
अच्छे और बुरे समय में अपना अभ्यास थामे रहो।
ईर्ष्या वह द्वार बंद करती है जिसे सीख खोलना चाहती है।
प्रयास करने जितना भरोसा रखो, फिर अनुभव को बोलने दो।
विनम्रता वहाँ से शुरू होती है जहाँ हम मानते हैं कि कितना कुछ हमारे नियंत्रण से परे है।
अपने संस्कारों को समझना पहली स्वतंत्रता है।
अपनी आशाओं की दिशा बदलने में कभी देर नहीं होती।
धूप और आँधी, दोनों शिक्षक हैं।
अपनी भलाई को आराम से ऊँचा लक्ष्य दो।
हर साधना के पीछे के उद्देश्य पर लौटो।
सही संकल्प एक नया आरंभ है।
बदलाव तुम्हारी सोच से तेज़ शुरू होता है।
जीवन छोटा और अधूरा है; गहरा काम अभी शुरू करो।
अपने विचार, प्रेम और कर्म को एक करो।
हर दिन उस ओर मुड़कर शुरू करो जो सबसे अधिक मायने रखता है।
बुद्धि और क्षमा, सत्य और शांति: सब उपहार हैं, ट्रॉफ़ियाँ नहीं।
तुम्हारे अच्छे गुण किसी बड़े से उधार हैं; विनम्र रहो।
दो, कोमल रहो, स्थिर रहो: जीवन भर के तीन सरल गुण।
तुम साधकों की एक लंबी परंपरा से आए हो।
विस्मय को अपना दैनिक अभ्यास बनने दो।
जो तुम्हारे हृदय में सच लगे, उसे स्वीकार करो।
कुछ शब्द तुम हज़ार बार सुनकर भी नहीं थकते।
विवेक की भूख एक अच्छी भूख है।
जो विद्यार्थी कभी तृप्त नहीं होता, वह सीखता रहता है।
उन शब्दों पर लौटो जो तुम्हें पोषित करते हैं।
जो चमकता है उसे देखो और पूछो कि चमक कहाँ से आती है।
पर्वत महान होने के लिए चिल्लाता नहीं।
बड़ा वृक्ष आश्रय और धैर्य का शांत शिक्षक है।
जल अनुकूलनशीलता सिखाता है: वह हर पात्र का आकार ले लेता है।
समय महान गणक है; अपने घंटों को सार्थक बनाओ।
शुद्ध हृदय कठिन परिवारों और कठिन समय में भी पनप सकता है।
शुद्ध करने वाली नदी चलकर शुद्ध करती है, बैठकर नहीं।
धैर्य वह धन है जिसे चुराया नहीं जा सकता।
अपने भीतर के वसंत का स्वागत करो।
अपनी चमक चरित्र से आने दो, चालाकी से नहीं।
अच्छे लोग प्रभावित करने की कोशिश किए बिना चमकते हैं।
जो तुम पहले से हो, उसका श्रेष्ठ रूप बनो।
तुमने जो देखा है, वह सागर की एक मुट्ठी भर है।
अधूरी विशालता के आगे विनम्र रहो।
तुममें या दूसरों में जो भी उत्कृष्ट है, वह उधार का प्रकाश है।
भ्रम से मुक्त होने पर कृतज्ञता स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।
स्वयं देखना चाहना ईमानदारी है।
धैर्य आँखों को तैयार करता है।
हमेशा कुछ ऐसा है जो तुमने अभी नहीं देखा।
आरंभ करने वाले की आँखें बनाए रखो।
केवल बताओ मत, दिखाओ; अपनी शिक्षा को जियो।
दीप्ति को तुम्हें अंधा नहीं, विनम्र बनाने दो।
अपने दिनों का दयालुता से उपयोग करो; वे असीम नहीं।
यह कहना विवेक है: मैं आपका उद्देश्य नहीं समझता।
पहले झुको, फिर पूछो; विनम्रता उत्तर खोलती है।
टालना बंद करो; काम प्रतीक्षा कर रहा है।
काम कठिन हो तब भी उसमें बने रहो।
तुम कठोर हुए बिना भी साहसी हो सकते हो।
जहाँ भी महानता मिले, उसका उत्सव मनाओ।
अनंत के प्रति विनम्रता सबसे विवेकी प्रतिक्रिया है।
अपना धन्यवाद दोहराओ; कृतज्ञता दोहराव में गहरी होती है।
जब जीवन बहुत बड़ा लगे, अपनी कोमल दिनचर्या में लौट आओ।
अपने विस्मय के क्षणों को सहज मत मानो।
अपनी साधना को तुम्हें कोमल करने दो, फुलाने नहीं।
वहीं से आरंभ कीजिए जहाँ आप हैं, वहाँ से नहीं जहाँ होने की इच्छा है।
किसी की राय को अपने आत्मसम्मान को बंधक मत बनाने दीजिए।
विनम्रता, ईमानदारी और कोमलता ज्ञान का जीवन बनाती हैं।
जितने हो उससे अधिक होने का दिखावा मत करो।
समय-समय पर भीड़ से हटो ताकि स्वयं को सुन सको।
हर अध्ययन से पूछो: यह मुझे कहाँ ले जा रहा है?
जो सबसे अधिक मायने रखता है, उसमें स्थिर रहो।
अपने स्वभाव को अपने सच्चे स्वरूप से मत जोड़ो।
स्वयं को जानना तुम्हें वही ढर्रे दोहराने से मुक्त करता है।
वह मार्ग चुनो जो तुम्हारे स्वभाव के अनुकूल हो।
सच्चा सुनना तुम्हें पार ले जा सकता है।
स्वयं को प्रकृति का साधन देखना विनम्रता लाता है।
ज्ञान की आँख धीरे-धीरे खुलती है, धैर्यपूर्ण देखने से।
सर्वोत्तम ज्ञान दोबारा सुनने योग्य है।
ऐसे सुनो जैसे पहली बार सुन रहे हो।
रुको: पूछो कि तुम आवश्यकता से कर्म कर रहे हो या बेचैनी से।
ध्यान के एक छोटे कर्म से शुरू करो।
अटकने के अपने पसंदीदा तरीके को पहचानो।
रोज़ प्रकाश को पोषित करो; वह हृदय की आदत बन जाता है।
किसी भी समय दिशा बदलो; गति को मोड़ा जा सकता है।
तुम ऐसी छोटी चीज़ें चुन सकते हो जो ऊपर उठाएँ।
दिशा रोज़ दोहराया जाने वाला चुनाव है।
स्वतंत्रता ढर्रे को देखना है, उसे बन जाना नहीं।
निर्भयता, शुद्धता, उदारता और आत्म-संयम: इन गुणों को इकट्ठा करो।
गुणों का रोज़ अभ्यास करो, छोटे तरीकों में भी।
ईमानदारी और साहस को साथ चलने दो।
अभिमान बोझ है; विनम्रता हल्का भार।
क्षमा करो, मजबूत रहो, विनम्र बने रहो।
ये गुण दुर्लभ नहीं; ये उगाए जाते हैं।
तुम्हारे बेहतर गुण वास्तविक हैं; उन पर भरोसा रखो।
वे गुण चुनो जो तुम्हें हल्का करते हैं।
अपने प्रकाश और अपनी छायाएँ, दोनों को जानो।
जिन विचारों पर तुम कर्म करते हो, उनकी जाँच करो।
स्वच्छ इरादे स्वच्छ मार्ग बनाते हैं।
एक बार में एक रस्सी ढीली करो।
अपनी छवि दूसरों को हराने पर मत बनाओ।
सच्चे आत्मविश्वास को शत्रुओं की ज़रूरत नहीं।
हानि के चक्र को पहले अपने जीवन में तोड़ो।
वह आदत चुनो जिसे तुम दोहराना चाहोगे।
जब तुम उन द्वारों को बंद करते हो, भलाई सहज आती है।
अपने लिए भला करना संसार के लिए भी भला करना है।
तुम चुन सकते हो कि तुम्हारे लिए सचमुच क्या भला है।
पहले पढ़ो, फिर कर्म करो।
तुम जिस पर भरोसा करते हो, धीरे-धीरे वही बन जाते हो।
कोमल, स्थिर अनुशासन कठोर उफानों से अधिक टिकता है।
अपने शरीर की बात वैसे सुनो जैसे किसी भरोसेमंद मित्र की।
कोमलता से साधना करो, बल से नहीं।
विश्राम, पोषण और देखभाल किसी भी सच्ची साधना का भाग हैं।
जब तुम अपनी साधनाओं के प्रति सुन्न महसूस करो, याद करो कि तुमने क्यों शुरू किया था।
एक सच्चे कर्म से फिर शुरू करो।
स्वच्छता, ईमानदारी और अहिंसा: आचरण का एक सरल अनुशासन।
शरीर का अनुशासन कर्म में कोमलता है।
सीधे चलो, ईमानदारी से बोलो, बिना हानि के कर्म करो।
परिणाम नहीं, स्थिरता को अपना शिक्षक बनने दो।
प्रशंसा के लिए किया अनुशासन नाज़ुक होता है।
जाँचो कि तुम्हारा अनुशासन तुम्हारी सेवा करता है या तुम्हारी छवि की।
हठ शक्ति नहीं; लचीलापन शक्ति है।
कोमल साधना भी गंभीर हो सकती है।
तुम कैसे शुरू करते हो, वह पूरे कर्म को आकार देता है।
देना, साधना और अर्पण को एक स्थिर लय बनाओ।
छोटी, स्थिर भलाई कभी-कभार की वीरता से बेहतर है।
सच्चाई वह है जो कर्म को मायने देती है।
कम काम अधिक श्रद्धा से करो।
अपने हृदय को अपने कर्म में लौटाओ।
अनुशासन आरंभ में विष और अंत में अमृत है।
अपना मार्ग अधूरेपन से चलना, किसी और के मार्ग को भली-भाँति चलने से श्रेष्ठ है।
आप अपनी भूलों से बढ़कर हैं।
किसी क्षणिक दुर्बलता को अपना नाम मत देने दो।
तुम्हारे हाथों को क्रोध नहीं, ज्ञान चलाए।
विवेक की परीक्षा इसमें होती है कि तुम कैसे बोलते, बैठते और चलते हो।
संतुष्ट मन काम तो करता है; बस अब परीक्षा देना बंद कर देता है।
हर सूचना तुम्हारे ध्यान की हक़दार नहीं।
कामना का एक तेज़ झोंका अनुशासन की लंबी यात्रा को उलट सकता है।
ईमानदार प्रश्न ही समझ की पहली सीढ़ी हैं।
तुम कैसे खोजते हो, वही तय करता है कि क्या पाते हो।
ज्ञान ग्रहण किया जाता है, छीना नहीं जाता।
बेहतर समझना शुरू करने में कभी देर नहीं होती।
स्पष्टता का एक क्षण वर्षों की आदत को भस्म कर सकता है।
स्वयं को समय दो; ज्ञान भीतर ही पकता है।
समझने के लिए प्रश्न करो, बचने के लिए नहीं।
निश्चित महसूस होने की प्रतीक्षा मत करो; आरंभ करो, निश्चय पीछे आएगा।
एक अच्छा प्रश्न वर्षों की भटकन बचा सकता है।
काम को वह साबुन बनने दो जो हृदय को स्वच्छ करे।
जानने के प्रकाश की ओर मुड़ो; छायाएँ तुम्हारे पीछे गिरती हैं।
अपना पूरा ध्यान उसी को दो जो सबसे अधिक मायने रखता है।
दिन शुरू होने से पहले स्वयं को मौन का एक कोना दो।
अपनी साधना के लिए स्वच्छ स्थान और स्थिर आसन चुनो।
अपने घर का एक छोटा कोना ठहराव का स्थान बना लो।
भय के बिना अनुशासन साधना है; भय के साथ वह दंड है।
रोज़ अपनी साधना पर लौटो; शांति रास्ता याद रखती है।
अपनी आवश्यकताओं के प्रति कोमलता भी विवेक का हिस्सा है।
साधना को स्वयं तक लौटने की कोमल यात्रा बनने दो।
दृढ़ता और कोमलता साथ चल सकती हैं।
एकदम से ठहराव की अपेक्षा मत रखो।
कोमल निरंतरता ज़ोर वाले प्रयास से अधिक टिकती है।
हर वापसी लौटने का रास्ता मज़बूत करती है।
जितना लौटते हो, उतना कम प्रयास लगता है।
इच्छा जितनी ही पद्धति भी मायने रखती है।
अच्छी शुरुआत करके भटक जाना मानवीय है।
जितना सोचते हो उससे बेहतर जगह से फिर शुरू करो।
पुरानी सीख ज़रूरत पड़ने पर जाग जाती है।
अच्छी तरह बनी आदतों को भारी काम करने दो।
निपुणता एक शांत संचय है।
सुनना पहला अभ्यास है।
जो समझ महसूस की जाती है, वही टिकती है।
बहुत कुछ हल्के से जानने से अच्छा है थोड़ा गहराई से जानना।
भीड़ से स्वयं को मत मापो; अपनी सच्चाई से मापो।
स्वयं को साधने से पहले अपने घटकों को जानो।
तुम्हारे भीतर का बीज तुम्हारे ध्यान की प्रतीक्षा कर रहा है।
विनम्रता बुद्धि को ईमानदार रखती है।
अपनी इच्छाओं को अपने मूल्यों के साथ कदम मिलाकर चलने दो।
वे चीज़ें चाहो जो तुम्हें बेहतर बनाएँ, छोटा नहीं।
खोया हुआ ज्ञान फिर पाया जा सकता है।
जब पूर्ण उपलब्ध हो तो अंश पर संतोष मत करो।
जो अभी दिखाई नहीं देता, उसके प्रति धैर्य रखो।
हर दिन खुले हाथ और खुले मन से शुरू करो।
पुरानी भूलें पीछे छोड़ो और भलाई के प्रति समर्पित हो जाओ।
अभी स्थिरता का अभ्यास करो; जब ज़रूरत होगी, वह वहाँ होगी।
जिन शब्दों को तुम नहीं समझते, उन पर सिर मत हिलाओ।
तुम्हारा ध्यान तुम्हारे भविष्य के लिए एक शांत मत है।
रोज़ अभ्यास करो, मन रास्ता सीख लेता है।
अपनी आंतरिक शक्ति साधारण दिनों में बनाओ, केवल संकट में नहीं।
शोर से हटना ही एकाग्रता की शुरुआत है।
एकाग्रता सही द्वार बंद करने की कला है।
छोटी बातों में निरंतर रहो, बड़ी बातें सहज आती हैं।
जब हम अपने घंटों को अनंत से मापते हैं, विनम्रता बढ़ती है।
वही कहानी तब तक लौटती है जब तक हम उसे देखना न सीख लें।
भ्रम के बजाय समझ चुनो, मार्ग खुल जाएगा।
भ्रम हमें उसी स्थान पर लौटा लाने का तरीका जानता है।
दोनों मार्गों को जान लो, तुम भटकोगे नहीं।
हर घड़ी अभ्यास करो; स्पष्टता दोहराव में बढ़ती है।
रास्ता जानना उस पर चलने का आधा भाग है।
आज स्थिरता चुनो, कल आसान होगा।
सबसे अच्छे विद्यार्थी तुलना से मुक्त होते हैं।
कान खोलने से पहले हृदय खोलो।
शिक्षा को वैसे लो जैसे उपहार लेते हो: कृतज्ञता से।
ज्ञानी प्रकृति से लड़ने के बजाय उसे दिशा देते हैं।
चीज़ों के साधारण रूप के पार देखो।
जो साधारण है उसे ठुकराओ मत; फिर से देखो।
महानता तुम्हारे भीतर के दिव्य गुणों को पोषित करना है।
अध्ययन भी उपासना का एक रूप है।
तुम्हारे आदर्श तुम्हारी दिशा बन जाते हैं।
आज शुरू करो; परिवर्तन अक्सर हमारी आशा से जल्दी आता है।
इसे एक बार और सुनो, नए कानों से।
दोहराया हुआ विवेक एक बार सुनने से गहरा उतरता है।
उनसे मार्गदर्शन लो जो तुम्हारा भला चाहते हैं।
ऐसे श्रोता बनो जिसे पढ़ाना सार्थक हो।
विनम्रता वहाँ से शुरू होती है जहाँ ऋषियों का ज्ञान भी समाप्त होता है।
भ्रमितों के बीच वह बनो जो स्रोत को याद रखता है।
सत्य, आत्म-संयम और शांति हर खोजने वाले को उपलब्ध हैं।
कोमलता, समचित्तता और उदारता का रोज़ अभ्यास करो।
जो विचार में शुरू होता है, वह पीढ़ियों को आकार दे सकता है।
अपना जीवन ऐसी चीज़ को दो जिसके बारे में बात करना सार्थक हो।
समझ उस हृदय में बढ़ती है जो बार-बार लौटता है।
अंतर्दृष्टि का पीछा मत करो; जिसे प्रेम करते हो उसके निकट रहो।
जब अनेक विवेकी स्वर सहमत हों, सुनो।
विवेकी लोगों और अपने अनुभव, दोनों से पुष्टि खोजो।
प्रत्यक्ष अनुभव को विरासत में मिले विवेक से मिलने दो।
वही शिक्षा फिर माँगने में कभी संकोच मत करो।
कुछ चमकते उदाहरण हमें बाकी देखना सिखा सकते हैं।
तुम्हारी वृद्धि ऊँची होने से पहले जड़ वाली हो।
उदात्तता कोमलता से निर्देशित शक्ति है।
आत्म-संयम भीतर की ओर मुड़ा न्याय है।
समय अक्षय है; हमारा ध्यान नहीं। उसे समझदारी से खर्च करो।
समय सबको समान देता है; उसका उपयोग दयालुता से करो।
यश, वाणी, स्मृति, बुद्धि, धैर्य, क्षमा: सात उपहार जिन्हें सँजोओ।
अच्छी लय भजन बनाती है, और अच्छी लय दिन बनाती है।
ज्ञानी जानते हैं कि संयम भी एक शक्ति है।
ज्ञान जमा करना बंद करो और जो जानते हो उसमें विश्राम करना शुरू करो।
स्पष्टता एक उपहार है; धन्यवाद कहो।
पहले सुनो, फिर देखो: गहरे सीखने का यही क्रम है।
सुनना अच्छा है; देखना उससे बेहतर।
शब्दों से अधिक की चाह रखने में संकोच मत करो।
अनुभव सच्चे प्रश्न का उत्तर है।
तत्परता पूछने की बात है, मान लेने की नहीं।
पूछना विवेक है: क्या मैं वह सह सकता हूँ जो मैं माँग रहा हूँ?
जैसे-जैसे तुम देखना सीखते हो, विस्मय बढ़ते हैं।
यह मत मान लो कि तुमने सब देख लिया है।
जब तुम देखना सीखने को तैयार होते हो, दृष्टि बढ़ती है।
हर महान अनुभव से पहले सुनना होता है।
दीप्ति हमें विनम्र बना सकती है, यदि हम उसे बनने दें।
विस्मय हमारी छोटी निश्चितताओं को हिला देता है।
अनंत को एक नज़र में नहीं समेटा जा सकता; उसे जीवन भर में समेटो।
जिसे तुम पूरी तरह नहीं देख सकते उसका आदर करो।
विशाल के आगे पद घुल जाता है।
समय की लंबाई के सामने प्रसिद्धि कितनी संक्षिप्त है, यह याद रखो।
विवेक लौ के सामने धीमा होना है।
समय की तपन को स्वीकारना तुम्हें अधिक कोमल बना सकता है।
महान के सामने ईमानदार उलझन एक अच्छी शुरुआत है।
भलाई में आनंदित हो, भले ही वह तुम्हें चुनौती दे।
अंतर्दृष्टि के उपहार विनम्र हाथों से ग्रहण करो।
तुम जो झलक पाते हो, उसे दर्शकों की ज़रूरत नहीं।
अपना मोल अपनी धार्मिक उपलब्धियों से मत मापो।
सच्चा संशय दोष नहीं, द्वार है।
जो मार्ग आपकी मानवीयता को अनदेखा करता है, उसकी चढ़ाई और कठिन हो जाती है।
बड़े प्रश्न पूछो: प्रकृति क्या है, स्वयं क्या है, जानना क्या है?
क्षेत्र की देखभाल कोमलता से करो: वह तुम्हारे दिनों का आधार है।
क्षेत्र को साधने से पहले उसकी प्रकृति सीखो।
स्वयं के अध्ययन की शुरुआत सरल प्रश्नों से करो।
अपनी बनावट का अध्ययन जिज्ञासा से करो, निर्णय से नहीं।
दृढ़ता भी एक गुण है जिसे तुम बढ़ा सकते हो।
दूसरों के प्रति धैर्य और अपने प्रति सीधेपन का अभ्यास करो।
सहनशीलता वह शक्ति है जिसे स्वयं को सिद्ध नहीं करना पड़ता।
स्थिरता उनका उपहार है जो बार-बार लौटते हैं।
जब भी हो सके, शोर के बजाय एकाग्रता चुनो।
हर विद्या विवेक नहीं; उसके फल को परखो।
विवेक अपनी दृष्टि लक्ष्य पर रखता है।
तुममें सबसे उज्ज्वल तुम्हारी उपलब्धियाँ नहीं, तुम्हारी सजगता है।
संक्षिप्त शिक्षा, गहराई से समझी गई, पर्याप्त है।
तुम समझने और प्रेम करने से तैयार होते हो।
तत्परता पूर्णता नहीं; यह सच्ची समझ और भक्ति है।
देखो कि तुम किससे आसक्त हो; वहीं तुम्हारी कहानी दोहराती है।
जो व्यक्ति ढर्रे को जानता है, वह उसमें फँसा नहीं रहता।
सुनने को समय के साथ समझ में गहरा होने दो।
शरीर और उसे चलाने वाली सजगता, दोनों का आदर करो।
अपने जीवन के पूरे क्षेत्र को ध्यान से प्रकाशित करो।
दोहराव ऊब नहीं; यही गहरी बातों के उतरने का तरीका है।
सर्वोत्तम विवेक को विनम्रता से ग्रहण करो।
भला होना अभिमान बन सकता है; अपनी भलाई को कोमलता से थामो।
शांति और समझ उपहार हैं, घमंड करने की उपलब्धियाँ नहीं।
स्वतंत्रता का अर्थ कोई आदत न होना नहीं, उन्हें स्पष्ट देखना है।
तुम अपने दिन को कैसे बिताते हो, यह चुनकर स्पष्टता को पोषित कर सकते हो।
चुनो कि तुम क्या खिलाते हो: तुम्हारा परिवेश तुम्हारे मन को आकार देता है।
अपने सबसे स्पष्ट घंटों की अनुभूति सीखो।
जल्दबाज़ी शायद ही कभी विवेकपूर्ण होती है।
तुम अभी जिस गुण को पोषित करते हो, वही तुम आगे ले जाते हो।
वर्षों में तुम जो इकट्ठा करो, वह विवेक हो।
तुम अपने भीतर जिसे पोषित करते हो, वह आज से आगे बढ़ता है।
आदतें गति हैं; चुनो कि तुम उसे किस दिशा में बनाते हो।
सुस्ती या जल्दबाज़ी को अपनी दिशा अपने आप तय मत करने दो।
जब हम ध्यान देना बंद करते हैं, अज्ञान गहराता है।
फल बदलने के लिए जड़ का गुण बदलो।
अपनी अवस्थाओं और उनके परिणामों को पढ़ना सीखो।
पूछो कि मुक्त व्यक्ति वास्तव में कैसे जीता है।
जिनकी तुम प्रशंसा करते हो, उनमें उपाधियाँ नहीं, गुण खोजो।
एक अच्छा प्रश्न: मैं वैसा कैसे बनूँ?
जिसे आप सींचते हैं वही बढ़ता है; देखिए आप क्या पोषित कर रहे हैं।
गहरी शिक्षाएँ इतनी सरल होती हैं कि जी जा सकें।
अध्ययन, अनुशासन और ईमानदारी एक दृढ़ नींव बनाते हैं।
खुले मन से दो, सच्चाई से पढ़ो, सीधेपन से जियो।
आत्म-संयम स्वतंत्र लोगों का अनुशासन है।
विनम्रता उनकी शोभा है जिन्हें तालियों की ज़रूरत नहीं।
भलाई में ऊर्जावान रहो और द्वेष से मुक्त।
हृदय की स्वच्छता एक शक्ति है।
पाखंड वह दूरी है जो तुम जो कहते हो और जो जीते हो उसके बीच है।
अभिमान तब बढ़ता है जब हम भूल जाते हैं कि हमें कितना दिया गया है।
अच्छी शिक्षा मार्ग और गड्ढे, दोनों का नाम लेती है।
जानो कि कौन-से गुण पोषित करने हैं और कौन-से छोड़ने हैं।
आचरण की स्वच्छता एक शांत सुरक्षा है।
सत्य जीवन को ऐसे स्थिर करता है जैसे चतुराई नहीं।
अपने मूल्यों पर फिर से लौटो; वे तुम्हें दिशा में रखते हैं।
अच्छा आचरण किसी अच्छे विचार की कसौटी है।
अभिमान और दिखावा खाली घर बनाते हैं।
दिखावे पर बना संकल्प टिक नहीं सकता।
अपने लक्ष्यों को चलाने वाले के बारे में ईमानदार रहो।
और अधिक की योजनाएँ ठीक हैं; उन्हें पर्याप्त की जगह मत लेने दो।
पूछो कि तुम्हें क्या सिद्ध करना है, और किसे।
धन को तुम्हें सलाह के प्रति बहरा मत बनाने दो।
धन नशा कर सकता है; अपने पैर ज़मीन पर रखो।
एक द्वार बंद करो और देखो कि तुम कितना हल्का महसूस करते हो।
क्या करना है, यह तय करने से पहले जानो कि विवेकी लोगों ने क्या सिखाया।
अपने चुनावों से परंपरा और विवेक दोनों को बोलने दो।
अच्छे निर्णय सीखने और सुनने से आते हैं।
व्यक्ति उससे बना है जिसमें वह विश्वास करता है।
देखो कि तुम किस पर भरोसा करते हो, तब जानोगे कि तुम क्या बन रहे हो।
तुम्हारे विश्वास तुम्हारे चरित्र को तुम्हारी जानकारी से अधिक आकार देते हैं।
उसकी प्रशंसा करो जो तुम्हें उठाता है, केवल उत्तेजित या डराने वाले की नहीं।
योग्य आदर्श तुम्हें एक साथ कोमल और साहसी बनाता है।
अभिमान से प्रेरित चरम साधनाएँ साधना नहीं, दिखावा हैं।
दिखावे के लिए आत्म-त्याग अहंकार का एक रूप है।
दैनिक चुनाव तुम्हारी प्रकृति की छोटी खिड़कियाँ हैं।
अपनी आदतों को जिज्ञासा से देखो, निर्णय से नहीं।
छोटी आदतें बड़े ढर्रे दिखाती हैं।
थोड़ी ताज़गी, थोड़ी गर्माहट, थोड़ी सफाई: छोटी दयालुताएँ।
देखभाल के बिना अच्छी साधनाएँ भी खोखली हो जाती हैं।
वाणी, शरीर और मन मिलकर पूर्ण साधना बनाते हैं।
शांत दृढ़ता सर्वोच्च तप है।
यदि तुम्हें दर्शक चाहिए, तो साधना अस्थिर है।
दिखावे से कमाया आदर दिखावे के साथ चला जाता है।
अपनी दयालुता के पीछे के उद्देश्यों के बारे में ईमानदार रहो।
चीज़ों को यह याद करके शुरू करो कि वे किसलिए हैं।
सत्य और भलाई साथ मिलकर दृढ़ आधार हैं।
सर्वोत्तम चीज़ें अक्सर पहले कड़वी लगती हैं।
साहस है ठहरना जब छोड़ देना सरल हो।
हर व्यक्ति का अपना शंख होता है।
कभी-कभी टूटना असली प्रश्न की शुरुआत होता है।
पहले उठो; बाक़ी समझ खड़े होकर आएगी।
विद्यार्थी वह है जो दिशा माँगने का साहस रखता है।
सही शब्द जानना और उन्हें जीना अलग बातें हैं।
प्रतिष्ठा वह है जो लोग कहते हैं; चरित्र वह है जो तुम तब बचाए रखते हो जब कोई नहीं देखता।
दूसरे तुम्हारी हिचक को भय समझ सकते हैं; अपने कारण स्वयं जानो।
स्पष्ट दृष्टि को कम आवाज़ों की ज़रूरत होती है।
खुलकर सुनो, फिर तब तक शांत बैठो जब तक जान न लो।
पसंद और नापसंद वे दो डोरियाँ हैं जो कठपुतली को हिलाती हैं।
संकल्प दरवाज़ा बंद कर सकता है, पर रुचि को केवल विवेक बदलता है।
आत्म-नियंत्रण वह फ़र्श है जिस पर विवेक खड़ा होता है।
रोज़ अभ्यास किया गया संयम चरित्र बन जाता है।
आज वही साधो जो तुम अंत में बनना चाहते हो।
ईमानदार उलझन गहरे उपदेश का द्वार है।
थामने के लिए एक स्पष्ट बात माँगिए।
भीतर लालसा के साथ बाहरी अनुशासन केवल दिखावा है।
‘मैंने किया’ कहानी का केवल एक भाग है।
आत्म-स्वीकार आत्म-परिवर्तन की शुरुआत है।
फल के पीछे दौड़ते हुए पूछो कि तुम वास्तव में किसे पूज रहे हो।
इंद्रियाँ सेवक हैं; उन्हें साधो, उनके आदेश मत मानो।
मर्यादा से जियो, जीवन स्वयं साधना बन जाता है।
अच्छा शिष्य विनम्र, जिज्ञासु और उपयोगी होता है।
एक मार्ग पर पूरी तरह चलो, तो दोनों पर चल लोगे।
अनुशासन के साथ चलो, लक्ष्य जल्दी आता है।
शरीर और मन का हर प्रयास तुम्हें निखार सकता है।
हर कार्य मन को माँजने का अवसर है।
सबसे बलवान वह है जो प्रतीक्षा कर सके।
जो तुम्हारे पास है उसमें आनंदित होने से पहले जो तुम हो उसमें आनंदित हो।
एक स्थान पर समेटा हुआ ध्यान शक्ति बन जाता है।
अकेले बिताए कुछ शांत मिनट पूरा दिन फिर से तय कर सकते हैं।
मन को शांत करने से पहले भूमि तैयार करो।
एक साथ सब ओर मत देखो; एक चीज़ को अच्छे से देखो।
शांति तब बढ़ती है जब तुम्हारे व्रत तुम्हारे अपने हों।
अच्छी तरह विश्राम करो, काम करो, खेलो, और हल्का जियो।
तुम जो हो उसमें विश्राम करो; बाकी प्रतीक्षा कर सकता है।
यह देखकर शुरू करो कि तुम्हारा ध्यान कहाँ खिंचता है।
दृढ़ बुद्धि, कोमल गति।
आत्म-संयम के बिना अच्छे इरादे भी रिस जाते हैं।
समझने तक पूछते रहो।
जिसे तुमने कभी चाहा था, उसकी ओर लौटो और उसे वापस आते देखो।
बीते कल की गति आज के लिए उपहार है।
प्रयास को उतना समय दो जितना उसे चाहिए।
भीतर की यात्रा कम लोग शुरू करते हैं; उससे भी कम पूरी करते हैं।
दुर्लभ मार्ग पर साथी की प्रतीक्षा किए बिना चलो।
तुम्हारी बुद्धि उधार का प्रकाश है; उसका कृतज्ञता से उपयोग करो।
जो बल सेवा करता है, उसे लालसा और रोष की ज़रूरत नहीं।
अपनी स्पष्टता की रक्षा करो; आदत और जल्दबाज़ी उसे आसानी से ले जाती हैं।
एक चीज़ को अपना पूरा हृदय दो और देखो वह कितना गहरा जाता है।
उदात्तता सच्चाई में है, उद्देश्य जो भी हो।
अपने लक्ष्यों को देखो और पूछो कि वे कितने समय तक टिकेंगे।
विशालता को अपनी समझ में फिट करने के लिए छोटा मत करो।
विरोधी जोड़ियाँ हर एक गहरे देखने का निमंत्रण है।
स्वच्छ विवेक दृढ़ प्रतिबद्धता को संभव बनाता है।
बड़े शब्दों पर जीवन टिकाने से पहले पूछो कि उनका अर्थ क्या है।
अपने स्वभाव को जानो, तुम जान जाओगे कहाँ से शुरू करना है।
अनुशासन तब मधुर होता है जब उसका उद्देश्य योग्य हो।
देखो कि तुम्हारे जीवन में कौन-से ढर्रे बार-बार लौटते हैं।
उजला मार्ग केवल स्थिरता माँगता है।
साधना तुम्हें कहीं ले जाने के लिए है; साधना पर ही मत रुको।
जो ज्ञान अभ्यास में सरल है, वह छोड़ा नहीं जाता।
तुम्हारा विवेक गरिमा में राजसी और अभ्यास में सरल हो।
हमें जो चलाता है उसका बड़ा भाग प्रकृति की धारा है; उसके भीतर दिशा देना सीखो।
अपनी प्रवृत्तियों को जानो; वे तुम्हारी नाव के पाल हैं।
विवेक के बिना की आशाएँ फलहीन प्रयास की ओर ले जाती हैं।
अपने कोमल, साहसी और विवेकी गुणों को बढ़ाना चुनो।
अच्छे जीवन की अपनी इच्छा का सम्मान करो, फिर उसके पार देखो।
उसकी प्रशंसा करो जो तुम्हें ऊपर उठाता है।
हृदय कितनी जल्दी बदल सकता है, इसे कम मत आँको।
यदि मार्ग सबके लिए खुला है तो सौभाग्यशाली लोगों के पास उस पर चलने का और कारण है।
अच्छी परिस्थितियाँ गहरे उतरने का निमंत्रण हैं, ढील का नहीं।
फिर से सुनो; सर्वोत्तम शिक्षाएँ दोहराने योग्य हैं।
परम के बारे में स्पष्टता मन को भूलों से साफ करती है।
कोई गुण केवल तुम्हारा नहीं; स्रोत को धन्यवाद दो।
तप शुभ की ओर मुड़ी इच्छाशक्ति है।
सही समझ तब आती है जब तुम तैयार हो।
जिसका तुम आदर करते हो, उसका वर्णन करो, तुम उसके निकट आते हो।
प्राचीनों को सुनो, पर आज तुमसे बोलती आवाज़ को भी सुनो।
गुरु से कहो कि संसार में पावन को दिखाएँ।
मार्गदर्शन का सच्चा अनुरोध विनम्रता का रूप है।
अपने शिक्षकों को आमंत्रित करो कि वे तुम्हें देखना सिखाएँ।
अच्छा प्रश्न पूछता है कि कहाँ देखना है, केवल यह नहीं कि क्या मानना है।
ध्यान कैसे दिया जाए, इसमें सहायता माँगना विवेक है।
और माँगो; सच्ची शिक्षा पोषित करती है, भरती नहीं।
सत्य के प्रति अपनी भूख को स्वस्थ रहने दो।
जो उभरकर दिखे उससे शुरू करो; बाकी पीछे आएगा।
किसी भी चीज़ के श्रेष्ठ की प्रशंसा परम तक जाने का द्वार है।
शक्ति पर्वत की तरह शांत भी हो सकती है और लौ की तरह उज्ज्वल भी।
तुम्हारी स्थिरता दूर से दिखाई दे।
सागर का चिह्न शोर नहीं, गहराई है।
उनसे सलाह लो जो पूर्ण को देखते हैं।
संयम में थामी शक्ति सर्वोच्च प्रकार की है।
अनुशासन सुजीवन का शांत विधान है।
आत्मा से शुरू करो, मध्य और अंत समझ आ जाएँगे।
पहला अक्षर सबसे कठिन और सबसे महत्वपूर्ण होता है।
स्मृति और बुद्धि ऐसे उपहार हैं जो कृतज्ञता के योग्य हैं।
एक कविता या कहानी उपदेश से अधिक दूर तक विवेक ले जा सकती है।
सिद्धांत सीखना हृदय को दर्शन के लिए तैयार करता है।
कुछ दृश्यों को देखने से पहले तैयारी चाहिए।
अपनी आँखों की सीमाओं के बारे में विनम्र रहो।
साक्षी जो देखा है वह सरलता और सत्य से बताते हैं।
अनंत की तरह, खुले हृदय से सब दिशाओं का सामना करो।
महानता के सामने खुले हाथ और शांत स्वर के साथ खड़े हो।
तुम्हारी गति औरों से भिन्न हो सकती है पर दिशा साझी है।
जल्दबाज़ी वह लौ है जो जल्दी करने वालों को जला देती है।
जब ज़रूरी हो झुको, और जब हो सके बोलो।
अपनी श्रद्धा को अपनी प्रतिद्वंद्विताओं से ऊपर उठने दो।
पावन के आगे अपना बायोडाटा रख दो।
पवित्रता को सीढ़ी की तरह मत बरतो।
स्थिर प्रेम चमकदार प्रयास से अधिक टिकता है।
कठिनाई स्वीकार करना दुर्बलता नहीं, ईमानदार दिशा-ज्ञान है।
स्थिर होने की प्रतीक्षा मत कीजिए; स्थिर होने तक अभ्यास कीजिए।
दृढ़ संकल्प शोर नहीं करता।
अच्छा विद्यार्थी उत्तर खोजने से पहले प्रश्नों की सूची बनाता है।
जो तुम अभी नहीं समझते, उसे नाम दो।
अपने शरीर को सँभालने योग्य क्षेत्र समझो, वह मत बनो।
अपने शरीर को वैसे सँभालो जैसे माली बगीचे को।
पूछो कि तुम्हारा जीवन किससे बना है और कहाँ से आता है।
क्षेत्र को समझना तुम्हें उसका बेहतर रखवाला बनाता है।
ध्यान से सुनो; कुछ शिक्षाएँ छोटी और गहरी होती हैं।
विवेक गीतों में आता है और तर्कों में भी; दोनों स्वागत योग्य हैं।
कविता और तर्क दोनों को तुम्हें समझ की ओर ले जाने दो।
व्यापक पढ़ो; सत्य के अनेक कथावाचक हैं।
आत्म-संयम पतवार पर स्थिर हाथ रखता है।
साधना को स्थिर स्थान और स्थिर हृदय चाहिए।
जो मुक्त करे उस विद्या को उस विद्या से अलग पहचानो जो केवल भरती है।
केवल बाहर मत खोजो; केवल भीतर भी मत खोजो।
नक्शा जानना और गंतव्य से प्रेम करना: यही तत्परता है।
ऊँचाइयों का लक्ष्य रखने से पहले स्वयं की मूल बातें सीखो।
अपने स्वभाव को स्वीकारो और उसके नीचे क्या है, इसके प्रति जिज्ञासु रहो।
व्यस्त कर्ता के भीतर के अनुभवकर्ता की देखभाल करो।
अपने भीतर के सहारे को अपना पहला शिक्षक बनने दो।
अपनी प्रकृति को मार्ग चुनने दो।
सुनने और भरोसा करने के आरंभिक मार्ग का तिरस्कार मत करो।
कुछ शिक्षाएँ इतनी केंद्रीय हैं कि शिक्षक उन पर लौटते हैं।
पूर्णता समझ का फल है, धैर्य से अपनाई गई।
जो शिक्षा अनेकों के लिए काम आई, वह तुम्हारे ध्यान के योग्य है।
तीनों गुणों को जानो और तुम उन पर सवार हो सकते हो, उनके सवार नहीं।
जुनून अग्नि है: सँभाला जाए तो गर्म, अंतहीन खिलाया जाए तो हानिकर।
छोटी आदतें तीनों के बीच संतुलन झुकाती हैं।
नई परियोजनाओं की झड़ी स्थिर न होने का एक तरीका हो सकती है।
हर दिन चुनो कि तुम क्या खिलाओगे: स्पष्टता, प्रेरणा या कोहरा।
तुम जो गति रखते हो, वही तुम्हारे मार्ग को आकार देती है।
सोचो कि तुम भविष्य के लिए कैसी गति बना रहे हो।
जो शांत प्रतीत होते हैं, उनके आचरण का अध्ययन करो।
अपने प्रश्नों को 'क्या है' से 'कैसे जीएँ' की ओर बढ़ने दो।
भ्रम सत्य का अभाव नहीं, उस पर पड़ा परदा है।
टिकाऊ और क्षणभंगुर को अलग करना विवेक का आरंभ है।
दिखावा, डींग और कठोरता ऐसी आदतें हैं जिन्हें छोड़ा जा सकता है।
अपनी भूलों का अज्ञान अहंकार को पोषित करता है।
अपने पूरे भीतरी भूदृश्य के बारे में ईमानदार रहो।
विवेक-दिशासूचक के बिना, चतुर लोग भी भटकते हैं।
ईमानदारी की आदतें जल्दी बनाने योग्य हैं।
विजय की डींग पतला कवच है।
सबका स्वामी महसूस करना इसका संकेत है कि तुमने सुनना बंद कर दिया है।
कोई तुलना से परे नहीं, और किसी की तुलना ज़रूरी नहीं।
विवेक की परंपराएँ नक्शा हैं; उन्हें अपने विवेक के साथ उपयोग करो।
अच्छा प्रश्न सच्चाई और व्यवस्था दोनों का सम्मान करता है।
ऐसे आदर्श चुनो जो तुम्हें विवेकी बनाएँ, केवल ऊँचे स्वर वाला नहीं।
जिस भूमि पर खड़े हो उससे युद्ध मत करो।
देखो कि तुम कैसे खाते, देते, काम करते और प्रार्थना करते हो।
अपनी पसंद से सीखो, उसके शासन में आए बिना।
अपने शरीर की प्रतिक्रिया को कोमलता से सुनो, कठोर नियमों के बिना।
नियमित पढ़ना जीभ और मन को स्थिर करता है।
जिस सम्मान का तुम पीछा करते हो वह भाग जाता है; जो चुपचाप कमाया जाता है वह रुकता है।
शब्द अपनाने से पहले उसका भेद पूछिए।
यह मत पूछिए ‘क्या मैं त्याग करता हूँ?’; पूछिए ‘मैं किस ढंग से त्याग करता हूँ?’
अटल संकल्प अनुशासित जीवन की रीढ़ है।
देखिए, हम कितनी बार ‘हमारा’ कहने से पहले ‘मेरा’ कहते हैं।
अपनी आवाज़ खोजिए, और उसे बजाइए।
साहस और जिज्ञासा साझेदार हैं।
पूछिए कि आप वास्तव में किसे प्रसन्न करना चाहते हैं।
बुद्धिमान मार्गदर्शक कहता है: देखिए, और पूरी तरह देखिए।
संयम साहस का एक रूप हो सकता है।
अपना अभिमान छोड़ो, अपने प्रश्न नहीं।
रुक जाना कभी-कभी सुनने की शुरुआत है।
सत्य के बारे में बोलने को उसे जानना मत समझ बैठो।
अच्छा नाम धीरे-धीरे बनता है और जल्दी खो जाता है।
संकल्प जानने और करने के बीच का सेतु है।
यदि कोई पुरस्कार निश्चित न हो, तब भी क्या तुम इतने ही मन से काम करोगे?
समभाव अभ्यास से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।
कुशल हाथ शांत होते हैं: न हड़बड़ी, न जकड़, न दिखावा।
आदर्श को दूर से मत सराहो; पूछो कि साधारण दिन में वह कैसा दिखता है।
तुम्हारी कौन-सी चाह वास्तव में ‘पर्याप्त’ महसूस करने की इच्छा है?
आँखें और कान द्वार हैं; भीतर कौन आए, यह तुम तय करते हो।
छोटे खिंचावों को मना करो, तो बड़े खिंचाव कमज़ोर पड़ते हैं।
अनुशासन है उस बात के प्रति जाग जाना जो मायने रखती है।
सच्चा प्रश्न उस अंतर को उजागर करता है जो हम जो सुनते हैं और जो करने को कहा जाता है, उनके बीच होता है।
कुछ लोग सोचकर विवेक पाते हैं; कुछ करके।
लोग वही नकल करते हैं जो देखते हैं, वह नहीं जो बताया जाता है।
आप जो करते हैं उसका बहुत कुछ आदत और प्रकृति से चलता है।
विवेकी भी अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करते हैं।
इंद्रियों से आरंभ कीजिए, बाकी सरल हो जाएगा।
अपने कर्मों का अध्ययन ऐसे करो जैसे विद्यार्थी किसी विषय का करता है।
जो भीतर तृप्त है, उसे तालियों की भूख नहीं रहती।
श्रद्धा से पूछो, उत्तर गहरे हो जाते हैं।
शिक्षक केवल खुले पात्र में ही उँडेल सकते हैं।
भक्ति सीख को ऊष्मा देती है; अनुशासन उसे टिकाऊ बनाता है।
आरामदायक नहीं, स्पष्ट उत्तर माँगो।
एक साधना की गहराई दूसरी साधनाओं को प्रकट कर देती है।
तुम कौन हो, यह समझ लेने से जो तुम नहीं हो उसका पीछा करना बंद हो जाता है।
अपने सर्वोच्च आदर्श को अपना निवास बना लो।
हिम्मत रखो: जो तुम खोज रहे हो, वह निकट है।
मुक्ति पर लक्ष्य टिकाओ, अनुशासन आनंदमय हो जाता है।
अपने तप को बोझ नहीं, अर्पण बनने दो।
आरंभ करने वाले को प्रयास चाहिए; आगे बढ़े हुए को शांति।
यदि तुम स्वयं को नीचे खींचते रहो तो तुम्हें कोई नहीं उठा सकता।
भीतर का वाद-विवाद जीतो तो बाहर के सरल हो जाते हैं।
अपने भीतर जो बिखरा है, उसके साथ नियमित बैठो।
मुद्रा शरीर का ध्यान देने का तरीका है।
अपना संयम आनंद से निभाओ, कुढ़कर नहीं।
अपने बिखरे अंशों को जोड़ते रहो।
थोड़ा अभ्यास भी, दोहराने पर, गहरे विश्राम में बदल जाता है।
अपनी दैनिक लय को कोमल और स्थिर रखो।
अपनी नींद का उतना ही सम्मान करो जितना अपने काम का।
हवा रहित स्थान बनाए जाते हैं, मिलते नहीं।
अभ्यास के साथ धैर्य रखो; वह धीरे-धीरे कुछ ढीला कर रहा है।
दोहराव से योग सहज हो जाता है।
स्थिरता चाहना और उसके लिए संघर्ष करना परस्पर विरोधी नहीं।
जो कठिन है, उसे मान लेना विवेक है।
अपने मन की शक्ति का आदर करो, तुम उसे बेहतर साध पाओगे।
आत्म-संयम वाहन है; प्रयास ईंधन।
अनुशासन वह मार्ग है जिससे आशा पहुँच के भीतर आती है।
पूर्ण स्पष्टता माँगने योग्य है।
पिछला अभ्यास हर बार लौटने पर तुम्हें आगे की शुरुआत देता है।
जो तुमने अभ्यास किया है, वह तुम्हें तुम्हारी समझ से अधिक दूर ले जाता है।
उपाधि पर मत रुको; अभ्यास तक जाओ।
अभ्यास को जानने से आगे बढ़कर उसे बन जाने का लक्ष्य रखो।
ज्ञान को अनुभव बनने दो, तब उसे अपना कहो।
प्रयास करना ही पहले से असामान्य है।
उन थोड़े लोगों में रहो जो भीतर शुरू किया हुआ पूरा करते हैं।
अनुशासन की अपनी एक ज्योति होती है।
अनुशासन चमके, जलाए नहीं।
प्रतिभा उधार दिया गया उपहार है।
ज़रूरत भी सच्ची खोज की शुरुआत हो सकती है।
जिसे तुम सबसे सच्चे मन से चाहते हो, उसमें दृढ़ रहो।
बिना समझ के निभाए नियम केवल वहीं पहुँचाते हैं जहाँ इच्छा इशारा करती है।
तुम्हारा भीतरी स्वभाव तुम्हारी आदतों से अधिक है।
अंतिम घड़ी उसकी परीक्षा लेती है जो दैनिक अभ्यास ने बनाया।
छोटी शिक्षा जीवन भर के मार्ग की ओर संकेत कर सकती है।
संक्षिप्त शब्द लंबा रास्ता खोल सकते हैं।
ऐसी पूर्णता का लक्ष्य रखो जिसे दोहराना न पड़े।
रास्ता जानते हो तो हर यात्रा आसान होती है।
दिन के उजाले में चलो, अर्थात् स्पष्ट देखते हुए।
छाया वह सिखाती है जो प्रकाश नहीं सिखा सकता।
तुम्हारे भले के लिए कहे शब्दों पर ध्यान दो।
अनेक द्वारा पुष्ट शिक्षा तुम्हारे ध्यान के योग्य है।
सुनने के बाद दिया गया विश्वास पहले दिए विश्वास से मजबूत है।
अपनी स्वीकृति समझ से कमाई जाने दो।
पूरा चित्र माँगो, केवल एक टुकड़ा नहीं।
महिमा देखना सीखना जीवन भर का अध्ययन है।
अनंत विषय सीखने का अर्थ है कहीं से शुरू करना।
संसार जो सुराग देता है, उन्हें उठाओ और उनका अनुसरण करो।
गाओ, नेतृत्व करो, सोचो, और उनके पीछे की सजगता को याद रखो।
मेरु, सुनहरा पर्वत: परिवर्तन के बीच एक स्थिर केंद्र बनो।
साहस और उड़ान दोनों एक निर्णय से शुरू होते हैं।
रास्ता चुनने से पहले सच्चा प्रश्न पूछिए।
वही मार्ग चुनिए जिस पर आपका हृदय आज चल सके।
अभ्यास स्थिरता तक पहुँचाने वाला धैर्यवान सेतु है।
अभ्यास दोहराता है; समझ गहराई देती है।
संकल्प में दृढ़, व्यवहार में कोमल रहिए।
संक्षिप्त शिक्षा जीवन भर की जाँच को गति दे सकती है।
करना और अनुभव करना दो अलग धाराएँ हैं; दोनों को देखना सीखो।
यदि बैठना कठिन है, सेवा करो; यदि सेवा कठिन है, विचार करो।
तुममें जो बढ़ता है, उसे तुमसे अधिक किसी ने बोया और पाला है।
सुख, कर्म और अज्ञान सब आदत बन सकते हैं।
नींद, गतिविधि और शांति स्पष्टता को जीतने में मदद करते हैं।
अभिमान और मोह उतार दीजिए, रास्ता हल्का हो जाएगा।
केवल प्रयास पर्याप्त नहीं; उसके साथ एक शुद्ध हृदय भी चलना चाहिए।
जो तुम्हारे पास है उस पर गर्व तुम्हें उससे छोटा बना देता है।
स्वाद, आदत और देना, हर एक हमारे स्वभाव को प्रकट करता है।
तुम जो पसंद करते हो वह बताता है कि तुम कैसे जी रहे हो।
स्पष्ट प्रश्न स्पष्ट जीवन की शुरुआत हैं।
विनम्रता अपनी भूमिका के बारे में सटीकता है।
हर कर्म जानने की एक चिनगारी से जन्म लेता है।
अंश को पूर्ण मान लेना संकीर्ण मन की जड़ है।
स्थिरता आरंभ करने से बनती है, भले ही आरंभ अधूरा हो।
संकल्प वह है जो मनोदशा बीतने पर भी बचा रहता है।
किसी और की राह से स्वयं को मापना बंद कीजिए।
सुनना विनम्रता का पहला कर्म है।
जिसे आप स्वयं में नकारते हैं, वह फिर भी आपके चुनावों को गढ़ता है।
उपदेश सुनिए, पूरी तरह मनन कीजिए, फिर चुनिए।
राजा को भी गुरु की आवश्यकता होती है।
छिपी धार वाली प्रशंसा बताती है कि वक्ता को वास्तव में क्या चुभ रहा है।
स्वयं को अपने बीते हुए कल से नापिए।
तत्परता निश्चितता नहीं है।
जिसका आप सामना करने वाले हैं, उसे पास से देखिए।
स्पष्ट देखना आपके इरादे को बदल सकता है।
वह पीड़ादायक क्षण होता है जब हम अपने उद्देश्य स्पष्ट देख लेते हैं।
गहराई से महसूस करना ही उत्तर की खोज का आरंभ है।
साहस उठने का वह निर्णय है जो तैयार महसूस करने से पहले लिया जाता है।
एक निर्णायक क़दम हिचक के जादू को तोड़ देता है।
न जानना पूछना शुरू करने की एक ईमानदार जगह है।
जिस-जिस को थामे हो, उससे पूछो: क्या यह टिकेगा?
सम्मानित लोगों के लिए निष्ठा आराम से अधिक मायने रखती है।
सम्मान अपने भावी स्वरूप से किया गया एक मौन वचन है।
ज्ञान मार्ग दिखाता है; अभ्यास उस पर चलता है।
एकाग्रता एक निर्णय है, जो रोज़ दोहराया जाता है।
सुंदर शब्द उथली समझ को छिपा सकते हैं।
विद्या तुम्हें अधिक विनम्र बनाए, अधिक मुखर नहीं।
कर्म से पहले पूछो: मैं सौदा कर रहा हूँ या अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहा हूँ?
सबसे अच्छे ढंग से किया गया काम अहंकार का कोई अवशेष नहीं छोड़ता।
जो मन भ्रम पार कर लेता है, वह राय बटोरना छोड़ देता है।
बहुत-सी शिक्षाएँ उसी मन को बिखेर सकती हैं जिसे वे स्थिर करने आई थीं।
ईमानदार प्रश्न वह खोल देते हैं जो विनम्र चुप्पी बंद रखती है।
हर बार जब तुम्हें अपने भटकने का भान होता है, वही प्रगति है।
इंद्रियों का उपयोग औज़ारों की तरह करो, स्वामियों की तरह नहीं।
प्रसन्न मन वह मिट्टी है जिसमें अच्छा निर्णय उगता है।
जीवन के शांत होने की प्रतीक्षा मत करो; व्यस्त रहते हुए ही शांति का अभ्यास करो।
जिसे तुम आज मना करते हो, उसकी कल ज़रूरत नहीं रह जाती।
अच्छा विद्यार्थी असुविधाजनक प्रश्न पूछता है।
स्पष्टता वह अनुरोध है जो आप कर सकते हैं।
वह मार्ग चुनिए जो आपके स्वभाव के अनुकूल हो।
हाथों के संयम को हृदय का संयम मत समझिए।
विनम्रता तब शुरू होती है जब आप देखते हैं कि कितना कुछ आपके किए का नहीं है।
बहुत से लोग अपने स्वभाव से चलते हैं और उसे अपना चुनाव कहते हैं।
उपदेश तब काम करता है जब वह जिया जाए, केवल बहस न हो।
उधार के मार्ग उधार के भय लाते हैं।
दर्पण को दिखाने से पहले पोंछना पड़ता है।
जिस ज्ञान का अभ्यास छूट जाए, वह एक पीढ़ी में धुँधला पड़ जाता है।
रूप धारण करो, पर अपना सार मत खोओ।
उचित कर्म को लेकर उलझन ही सच्चे अध्ययन का आरंभ है।
घर में ही नहीं, हृदय में भी कम संग्रह करो।
मार्गों की तुलना चलने का समय खा जाती है।
आंतरिक अनुशासन समझ से जली हुई अग्नि है।
भक्ति से किया गया अध्ययन भी अर्पण है।
हर चीज़ पर संदेह करने से किसी एक बात को परखने की ओर बढ़ो।
वह साधना चुनो जिसे तुम रोज़ निभा सको।
सोचना और करना एक ही यात्रा के साथी हैं।
अपने दैनिक श्रम को स्वयं की कार्यशाला बना लो।
एकाग्र हृदय वहाँ पहुँचता है जहाँ बिखरे हृदय भटकते हैं।
आवेग के नीचे स्थिरता साधना का प्रमाण है।
ठहराव अभ्यास से आता है, संयोग से नहीं।
इतने जड़ हो जाओ कि धन तुम्हें लुभा न सके।
साधना पहले एकांत में बनती है, फिर सबके सामने दिखती है।
अच्छी आदतें अच्छी तैयारी से शुरू होती हैं।
ठीक से थामा हुआ अवकाश अनुशासन का हिस्सा है।
कठिनाई पर निराश मत हो; पूछो कि तुम्हारी पद्धति सही है या नहीं।
हर संक्रमण के लिए एक सही तैयारी होती है।
सातों गुणों को पोषित करो; कोई भी केवल दिखावे के लिए नहीं।
ईमानदार आत्मबोध यात्रा को हल्का कर देता है।
रोज़ की स्थिरता, स्वयं से निभाए छोटे वादों से बनती है।
अपने घटकों को जानना तुम्हें अधिक शांत जीवन पकाने में मदद करता है।
विवेक पूरे को देखने से आरंभ होता है, किसी एक शाखा से नहीं।
स्वतंत्रता वह निर्णय है जो हर दिन फिर लेना पड़ता है।
विनम्रता वह द्वार खोलती है जिसे अभिमान बंद रखता है।
आदत को जितना सँवारते हैं, हृदय को भी उतना ही सँवारिए।
विनम्रता यह जानना है कि सदा कुछ और ऊँचा है।
जब समझ पूर्ण होती है, संशय के ठहरने की जगह नहीं रहती।
सच्ची समझ आपके कल के कर्म बदल देती है।
साहस यह भी है कि जो अभी समझ नहीं आया, उसे पूछ लिया जाए।
आप क्या छोड़ते हैं, उससे अधिक मायने रखता है कि क्यों छोड़ते हैं।
अपने कर्म छाँटने से पहले अपने उद्देश्य छाँटिए।
जाँचिए कि आपका ‘ना’ स्पष्टता से आता है या कोहरे से।
पाँच कारण जान लीजिए, तो श्रेय विनम्र हो जाता है।
कृतज्ञता कारणों का ईमानदार हिसाब है।
स्वयं को अकेला कर्ता मानना देखने का अधूरा ढंग है।
विवेक निष्कर्ष खींचने से पहले चौखट को चौड़ा करता है।
छलाँग से पहले अपनी सीमाएँ जानिए।
संकल्प वह निर्णय है जिसे आप निभाते हैं, वह भाव नहीं जिसे आप अनुभव करते हैं।
टालमटोल स्वयं का धीमा क्षरण है।
छोटे कर्म जड़ता की औषधि हैं।
संकल्प को मज़बूत करने से पहले विवेक को धार दीजिए।
अभ्यास संकल्प का दैनिक प्रमाण है।
पूछिए कि कोई पुरस्कार न दे, तो आप क्या करते रहेंगे।
प्रसन्नता अवस्था बनने से पहले एक कौशल है।
स्वतंत्रता इस स्वीकार से शुरू होती है कि आपमें कितना कुछ आदत है।
शांति, संयम और शुद्धता: स्थिर जीवन के मौन गुण।
विवेक वहाँ बढ़ता है जहाँ धैर्य, सच्चाई और विनम्रता मिलते हैं।
कठिन चीज़ों से भागिए मत; उनमें बढ़िए।
प्रेम से किया गया कर्तव्य एक शांत प्रकार की निपुणता बन जाता है।
एक संक्षिप्त उपदेश, पूरी तरह जिया जाए, तो पर्याप्त है।
शुद्ध बुद्धि और दृढ़ संकल्प मिलकर स्पष्ट पथ बनाते हैं।
हल्का खाइए, कोमल बोलिए, और मन हल्का हो जाएगा।
अहं से जन्मा संकल्प जीवन द्वारा शीघ्र खोल दिया जाता है।
स्वभाव अपने कार्य की ओर खींचता है; विवेक दिशा चुनता है।
आदतें तब तक नियति हैं जब तक उन्हें देखा न जाए।
गहराई से ग्रहण कीजिए, स्वतंत्रता से निर्णय कीजिए।
पहला प्रश्न पूछने वाले को प्रकट कर देता है।
प्रतिद्वंद्वी का कौशल इसका दर्पण है कि आप अभी क्या सीख सकते हैं।
दूसरों के कौशल की सराहना कीजिए, अपने को घटाए बिना।
हम अक्सर अपने पक्ष को उसकी कमियों से और दूसरे को उसकी शक्तियों से परखते हैं।
संसार की ढोल-थाप का उत्तर देने से पहले ठहरिए।
आपके उपहार का एक नाम है; उसका उपयोग कीजिए।
कर्म से पहले अपने मार्गदर्शक की ओर मुड़िए।
आत्मविश्वास प्रश्न पूछता है; अहंकार आदेश देता है।
ऊँचा दृष्टि-बिंदु त्वरित उत्तर से अधिक मूल्यवान है।
सबसे अच्छे मार्गदर्शक आपको वहीं ले जाते हैं जहाँ आप कहें, और फिर आगे राह दिखाते हैं।
कर्म से पहले का ठहराव वह उपहार है जो आपका मार्गदर्शक दे सकता है।
कभी-कभी मार्गदर्शक का कार्य आपको वह दिखाना है जिससे आप बचते रहे हैं।
दोनों ओर जाने-पहचाने चेहरे देखना हर निश्चितता को विनम्र कर देता है।
जब आपके लक्ष्य आपके अपने न लगें, तब उन्हें फिर परखिए।
स्वयं से पूछिए कि आप यह वास्तव में किसके लिए कर रहे हैं।
बेहतर जानना बेहतर करने को कहता है।
जागरूकता जवाबदेही की शुरुआत है।
ईमानदार पछतावा आरामदेह इनकार से बेहतर है।
अपने पछतावे को दिशा-परिवर्तन में बदल दीजिए।
बिखरना सीखने का द्वार हो सकता है।
ऐसी मनोदशा के आगे समर्पण मत करो जो तुम्हारे अपने स्तर से नीची हो।
शक्ति है यह याद रखना कि तुम क्या कर सकते हो।
‘मैं नहीं करूँगा’ का अर्थ कभी-कभी केवल इतना होता है: ‘मैं अभी समझा नहीं हूँ।’
चतुर शब्द उस हृदय के पास बैठ सकते हैं जिसने अभी समझा नहीं।
धैर्य क्षणिक चीज़ों को गुज़रने देने की कला है।
स्थिरता एक कुशलता है जिसे बढ़ाया जा सकता है।
इस विचार को तुम्हें साहसी बनाने दो।
रहस्य के विद्यार्थी बनो, उत्तरों के स्वामी नहीं।
कर्तव्य में स्थिरता आत्म-सम्मान का ही एक रूप है।
उस क्षण को हाँ कहो जो तुमसे तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ माँगता है।
निष्ठा को बनाए रखना उसे दोबारा बनाने से आसान है।
दूसरों का सम्मान एक उपहार है, नींव नहीं।
अपनी शक्ति को चुपचाप जानो, ताकि दूसरों के शब्द उसे छोटा न कर सकें।
साहस परिणाम जानने से पहले खड़े होने का चुनाव है।
छोटा आरंभ करो; यहाँ कुछ भी खोता नहीं।
वाक्पटुता और अंतर्दृष्टि एक नहीं हैं।
भोग में दोष नहीं; उसके स्वामित्व में आ जाना दोष है।
तुम्हारे काम का कौन-सा अंश जीत हो या हार, अछूता रह सकता है?
एक अच्छा प्रश्न स्थिरता की ओर पहला क़दम है।
न बहुत ऊँचे स्वर में उत्सव मनाओ, न बहुत जल्दी कोसो।
तुम वास्तव में किससे बच रहे हो: आदत से, या उसके नीचे की भूख से?
लालसा को ध्यान से भूखा रखो और वही ध्यान किसी श्रेष्ठ चीज़ को दो।
आत्म-संयम को अपने से बड़े किसी उद्देश्य की ज़रूरत होती है।
अपनी पसंद को पसंद ही रहने दो; उसे आदेश मत बनने दो।
हवा उठने से पहले जान लो कि क्या मायने रखता है।
जो मन अपनी इंद्रियों के पीछे नहीं चलता, वह अपना जीवन स्वयं चलाता है।
सच्ची शिक्षा तब शुरू होती है जब आप कहते हैं, ‘मुझे नहीं दिखता कि ये कैसे मेल खाते हैं।’
भीतर और बाहर, दोनों का साथ का अनुशासन ही श्रेष्ठ है।
अगले छोटे कर्तव्य से आरंभ कीजिए।
भाग लीजिए; केवल उपभोग मत कीजिए।
निरंतरता शिक्षा का एक रूप है।
अहं वह श्रेय माँगता है जिसके अधिकारी परिस्थितियाँ हैं।
संशय का स्वागत है; अंतहीन संशय इनकार है।
निरंतर दोष खोजना हमें सीखने से रोकता है।
जिज्ञासा वे द्वार खोलती है जो आलोचना बंद करती है।
अपने स्वभाव को समझिए, फिर उसके साथ काम कीजिए, उसके विरुद्ध नहीं।
आदत बलवान है; धैर्य उससे अधिक बलवान।
किसी और का जीवन, सराहनीय होने पर भी, असहज नाप का होता है।
पूछिए कि जब आप चुन नहीं रहे होते, तब आपको कौन धकेलता है।
संसार को साधने से पहले अपनी प्रतिक्रियाओं को साधिए।
आपके स्वयं का हमेशा एक गहरा स्तर है जिससे परामर्श किया जा सकता है।
जो भली-भाँति सीखा है, वह आगे सौंपने के लिए है।
सिर हिलाकर मत चलो; तब तक पूछो जब तक बात समझ न आए।
समझो कि तुम क्यों कर्म करते हो, और कर्म की पकड़ ढीली हो जाएगी।
समझ को वह अग्नि बनने दो जिससे तुम्हारा काम गुज़रे।
क्या सुनते हो, इसे उतनी ही सावधानी से चुनो जितना क्या बोलते हो।
अपने अनुशासन को आराम से परे किसी उद्देश्य की सेवा में लगाओ।
संयम भी अर्पण का एक शांत रूप है।
तुम्हारी साधना का रूप जो भी हो, वह करने से शुरू होती है।
सीखते रहो, तो तुम्हारा श्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
सबसे शुद्ध गुरु तुम्हारा अपना स्थिर अभ्यास है।
एक राह के प्रति प्रतिबद्ध रहो; वह तुम्हें सबके बारे में सिखाएगी।
साधना ही त्याग को संभव बनाती है।
स्थिर साधना से शुरू करो; त्याग पीछे आता है।
साधारण कर्मों को करने के लिए अहंकार की ज़रूरत नहीं।
जब तुम्हारा उद्देश्य तुमसे बड़ा हो, संशय छँट जाता है।
अनुशासन और समझ मिलकर शांति को पहुँच में ला देते हैं।
रोज़ थोड़ी देर शोर से हट जाओ।
जानो कि तुम किस चरण में हो और उसी के अनुसार अभ्यास करो।
प्रगति का चिह्न कम पकड़ है, अधिक नियंत्रण नहीं।
अभ्यास तुम्हारे मन को भरोसेमंद बनाता है।
कुछ बातें गहराई से जानो, संसार की चमक फीकी पड़ जाती है।
अक्सर, चुपचाप और संभव हो तो अकेले अभ्यास करो।
एक चीज़ पर तब तक ध्यान रखो जब तक वह मित्र न बन जाए।
सीधी रीढ़ एक कोमल अनुशासन है।
स्थिर आत्म-संयम आत्म-सम्मान का एक रूप है।
स्थिर दिनचर्या एक कोमल शिक्षक है।
दुःख से मुक्ति वैसे ही सीखी जाती है जैसे कोई भाषा।
इंद्रियों को चारों ओर से संयमित करो, कोमलता के साथ।
आज फिर वह छोटा अभ्यास करो।
पूरा पूछो; आधे उत्तर तभी लो जब मजबूरी हो।
सड़क मुड़े तब भी अच्छी शुरुआत का फल मिलता है।
बाधित साधना भी कोमल पड़ाव तक पहुँचाती है।
निम्न स्वयं से जीवंत स्वयं तक उठो।
अपने प्रयास को स्वच्छ और उज्ज्वल जलने दो।
अच्छे प्रश्न उत्तर खोजने से पहले शब्दों को नाम देते हैं।
उन गुणों की सूची बनाओ जिनका तुम सबसे अधिक आदर करते हो।
हर प्रकार में सबसे उदात्त को देखो और उसकी गरिमा से सीखो।
मार्गों की तुलना अपने अनुकूल रास्ता खोजने के लिए कीजिए, अहंकार को पोसने के लिए नहीं।
कौन श्रेष्ठ है, यह पूछना मान लेना है कि अभी सीखना शेष है।
ऐसा मार्ग उधार न लीजिए जिस पर आपका स्वभाव अभी चल नहीं सकता।
अपनी सीमाओं के प्रति धैर्य भी साधना का हिस्सा है।
छलांग न लगे तो सीढ़ी चढ़िए।
समझ के बिना अभ्यास दिशासूचक के बिना नाव है।
हर साधना से पूछिए: क्या इसने मुझे अधिक मुक्त किया?
गिला छोड़िए, सीख रख लीजिए।
पवित्रता स्पष्ट मंशा है, बेदाग़ छवि नहीं।
जिया हुआ एक सिद्धांत, समझे हुए हज़ार सिद्धांतों से बड़ा है।
आदतें वे जड़ें हैं जो रोज़मर्रा के जीवन में नीचे तक उतरती हैं।
जड़ पकड़ने से पहले ही देख लीजिए कि क्या अंकुरित हो रहा है।
इस वृक्ष को कोई पूरा नहीं देखता; जो पहुँच में है, उसे ढीला करके आरंभ कीजिए।
दृढ़ हाथ और शांत मन से काटिए।
सोच-समझकर चुनिए कि आप कौन-सी सुगंधें बटोर रहे हैं।
आज का ध्यान कल के झुकाव को गढ़ता है।
जो गहराई से देखते हैं, वे वह पा लेते हैं जो व्यस्त लोग चूक जाते हैं।
भीतर देखना अभ्यास से बना कौशल है।
धैर्य उसे चमकाता है जिसे जल्दबाज़ी केवल खरोंचती है।
विकास प्रयास से पहले उपहार है।
भोजन और विचार, दोनों में उतना ही लीजिए जितना सचमुच पच सके।
जो सिखाया गया है, उसे अब जीना है।
जो पूरी शिक्षा समझ लेता है, वह शांत आत्मविश्वास लेकर चलता है।
कर्म के दोष बेहतर कर्म से मिटते हैं, कर्म न करने से नहीं।
प्रश्न से बहस करने से पहले निष्कर्ष सुनिए।
विवेक वहाँ शुरू होता है जहाँ आप भेद को नाम दे पाते हैं।
अनुशासन एक शांत प्रकार की सफ़ाई है।
विवेक का वेश पहने आलस्य देर तक किसी को धोखा नहीं देता।
इसे वैराग्य मत कहिए यदि यह वस्तुतः बचाव है।
आवश्यकता हो तो विश्राम कीजिए, पर थकान को ज्ञानोदय मत कहिए।
विवेक कार्य देखता है, पसंद-नापसंद नहीं।
कारण जान लें तो आप दोष कम देंगे और सीखेंगे अधिक।
कारणों के प्रति अपनी दृष्टि चौड़ी कीजिए; अहं अपने सही आकार में आ जाएगा।
जो आपको कर्म की ओर प्रेरित करता है, वह परखने योग्य है।
वह गुण चुनिए जिससे आप कर्म करना चाहते हैं।
केवल भेद देखना आधा देखना है।
जब प्रमाण थोड़े हों, तब अपने मत को ढीला थामिए।
शांत सत्यनिष्ठा कर्म का उच्चतम रूप है।
भारी प्रयास अच्छा प्रयास नहीं होता।
मोह जल्दबाज़ी करता है; विवेक आगे देखता है।
चिपकने से भी मुक्त रहिए, और डींग से भी।
आलस्य ‘बाद में’ फुसफुसाता है, जब तक ‘बाद में’ कभी आता ही नहीं।
बुद्धि और धृति: जीवन की दो लगामें।
आधा-स्पष्ट विवेक सबसे ख़तरनाक होता है।
स्थिरता वह उपहार है जो आप अपने भविष्य के स्वयं को देते हैं।
अपना अनुशासन स्थिर रखिए, कठोर नहीं।
लाभ से बँधा संकल्प लाभ मिटते ही टूट जाता है।
अंधेरे में लंबी प्रतीक्षा से बेहतर है उजाले की ओर एक छोटा कदम।
आरंभ की कड़वाहट सहिए; मिठास पीछे आती है।
आत्म-ज्ञान मुक्ति जैसा स्वाद देने से पहले अप्रिय लगता है।
किसी साधना को उसके पहले सप्ताह से मत परखिए।
जो आराम आपको सुस्त कर दे, वह आराम नहीं है।
अपने मार्ग की तुलना अपने स्वभाव से कीजिए, किसी और की राह से नहीं।
सत्यनिष्ठा सरल जीवन को संभव बनाती है।
पूर्णता छोटे कर्तव्यों से बनती है जो पूरे मन से किए गए हों।
निपुणता प्रतिभा से कम, निष्ठा की ऋणी होती है।
प्रामाणिकता नकल से जीतती है, भले नकल चमकदार दिखे।
दोषरहित परिस्थितियाँ मिथक हैं; फिर भी आरंभ कीजिए।
अपूर्ण कर्म पूर्ण हिचक से श्रेष्ठ है।
स्वयं को जीतिए, फिर संसार के पास आपको जीतने के लिए कम बचता है।
अहं वह बाधा है जो सहायता से इनकार करने पर बढ़ती है।
अभिमान नाटकीय इनकार पसंद करता है; विवेक ईमानदार चुनाव।
देखिए कि आप वास्तव में किससे भाग रहे हैं।
अपनी प्रवृत्तियाँ जानिए, वरना वे बिना पूछे गाड़ी चला लेंगी।
अपने स्वभाव के साथ काम कीजिए, उसके विरुद्ध नहीं; प्रयास हल्का हो जाएगा।
अच्छा गुरु निर्णय आप पर छोड़ता है।
अच्छा साक्षी वह बताता है जो है, वह नहीं जो आप चाहते हैं।
अनिश्चितता में गुरु के पास जाना समझदारी है; केवल आश्वासन खोजना नहीं।
जो आत्मविश्वास मान्यता के लिए दूसरों की ओर दौड़ता है, वह अक्सर नाज़ुक होता है।
देखिए कब आप दूसरों की शक्तियों को आरोप की तरह बयान करते हैं।
प्रतिस्पर्धियों की सूची को अपनी पहचान मत बनने दीजिए।
वीरता अनेक रूपों में और अनेक स्थानों से आती है।
गुरु अपने प्रशिक्षित लोगों के माध्यम से स्वयं को बहुगुणित करते हैं।
प्रतिभा की कोई न्यूनतम आयु नहीं होती।
जो आप जानते हैं सीधे कहिए, पर सुनने वाले के विवेक पर भरोसा रखिए।
सबसे सशक्त सहयोगी भी आपकी अपनी स्पष्टता का स्थान नहीं ले सकते।
जिस आत्मविश्वास को घोषित करना पड़े, वह पहले से काँप रहा होता है।
किसी और से मेल खाने के लिए अपने वाद्य को मद्धम मत कीजिए।
जो आपको हिलाता है, वह बताता है कि आप किस पर टिके हैं।
देखिए कौन किसी को प्रसन्न करने की इच्छा से कर्म कर रहा है।
अच्छा गुरु आपके प्रश्न को उसके स्रोत तक ले जाता है।
जिसे आपका शरीर आपसे देखने को कह रहा है, उसे अनदेखा करके मत चलिए।
दूरदर्शिता हृदय का शांत गणित है।
उस सहज बोध पर भरोसा कीजिए जो आपको धीमा होने को कहता है।
याद कीजिए आपने आरंभ क्यों किया था।
हानि पहुँचाने से इनकार करना शक्ति का एक रूप है।
दूसरे का दोष स्पष्ट देख लेना हमें उसे दोहराने का अधिकार नहीं देता।
दूसरों का अंधापन हमारे अपने अंधेपन का बहाना नहीं।
आप अपने आस-पास के लोगों से भिन्न चुनाव कर सकते हैं।
जो आप आगे देना चाहते हैं, उसे जीकर सिखाइए।
विवेक वह सुनता है जो बड़ों ने कठिन अनुभव से सीखा है।
देखिए कब छोटी इच्छाएँ बड़े निर्णयों को चला रही हैं।
हानि होने से पहले जाग जाइए।
बोध एक उपहार है, भले ही वह चुभे।
तुच्छ दुर्बलता बहानों से खिलाने पर बढ़ती है।
अपने श्रेष्ठ रूप को अपने छोटे रूप को टोकने दो।
क्या तुम जिन्हें आहत करते हो, उनकी आँखों में देखकर भी इस सफलता का उत्सव मना सकोगे?
जो तुम नहीं जानते उसे स्वीकारो; यहीं से बुद्धिमान कर्म शुरू होता है।
विनम्रता भ्रम को पूछने योग्य प्रश्न में बदल देती है।
एक स्पष्ट ‘मुझे सिखाइए’ सौ अभिमानी राय से अधिक मूल्यवान है।
उस क्षण को सहो, पर उसे अपनी पहचान मत बनाओ।
जो तुम्हें हिलाता है, वही दिखाता है कि तुम्हारी जड़ें कहाँ उथली हैं।
शरीर को देखभाल से थामो और आत्मा को भरोसे से।
शरीर की सीमाओं का सम्मान करो, पर उन्हें अपनी सीमाएँ मत समझो।
अहंकार कर्म पर दावा करता है; विवेक बड़े प्रवाह को देखता है।
नए अध्याय तुमसे आदत का पुराना वस्त्र उतारने को कहते हैं।
विस्मय द्वार है; जानना उसके पार का कक्ष है।
तुम्हारा क्या करने का है, इस पर संशय भीतर देखने से सुलझता है, चारों ओर देखने से नहीं।
जो तुम्हारा करने का है उससे बचना धीरे-धीरे तुम्हारे आत्म-सम्मान को घिसता है।
आज तुम जो करते हो, वही बन जाता है कि तुम्हें कैसे याद किया जाएगा।
लोग तुम्हें अपने शब्दों में समझाएँगे; तुम्हें अपना सत्य स्वयं जानना होगा।
जो तुम्हारी शक्ति पर संदेह करते हैं, वे तुम्हारे कारण नहीं जानते।
ग़लत समझे जाने से अधिक पीड़ादायक क्या है? अपने प्रति सच्चा न रहना।
पहले समझो, फिर साधो: विवेक के दो अर्ध हैं।
बहुत सारे लक्ष्य अंततः कोई लक्ष्य नहीं रह जाते।
उनसे सावधान रहो जो कहते हैं कि जो वे जानते हैं, उसके पार कुछ नहीं।
उद्धरण कम दो, अभ्यास अधिक करो।
विवेक में निवेश करो; कोई परिणाम उसे छीन नहीं सकता।
यदि परिणाम का बोझ तुम्हें न उठाना होता, तो तुम क्या करने का साहस करते?
तुम्हारा दिन कैसे बदलता यदि कोई चापलूसी या अपमान तुम्हें छू न पाता?
ध्यान को वापस खींचना किसी भी अन्य कला जैसी एक कुशलता है।
रोज़ एक छोटी वापसी का अभ्यास करो: बिना किसी इनपुट के एक शांत मिनट।
प्रलोभन से केवल बचो मत; उससे ऊपर उठो।
विक्षेप दृढ़ है; इसलिए ध्यान को भी दृढ़ होना होगा।
अपने विवेक को वैसे बचाओ जैसे अपनी सबसे क़ीमती चीज़ को बचाते हो।
आज कौन-सी छोटी बात तुम्हारे मन को थोड़ा और प्रसन्न बना सकती है?
पहले स्थिरता साधो; आनंद पीछे आने वाला अतिथि है।
ध्यान के पाल सोच-समझकर चढ़ाओ।
शक्ति है अपने ध्यान को रोक पाने की मौन क्षमता।
तुम्हारी प्राथमिकताएँ दूसरों को नींद जैसी लग सकती हैं; फिर भी उन पर टिके रहो।
अपने प्रतीयमान विरोधाभास अपने गुरु के पास लाइए।
बहुत सारे शब्द एक सरल मार्ग को धुँधला कर सकते हैं।
प्रकृति हमें चलाती है, चाहे हम चुनें या नहीं; सचेत होकर चुनिए।
यह दिखावा बंद कीजिए कि आप जीवन से बाहर हो सकते हैं।
ईमानदारी से देखिए कि आपका ध्यान वास्तव में कहाँ रहता है।
आत्म-प्रवंचना बेईमानी का सबसे शांत रूप है।
प्रेरणा की प्रतीक्षा मत कीजिए; अगला सही कार्य कीजिए।
अपने पाने को देने से संतुलित कीजिए।
पूछिए कि आप संसार के घूमने में क्या जोड़ते हैं।
जो भीतर से तृप्त हैं, उन्हें कुछ सिद्ध नहीं करना होता।
चरित्र संक्रामक होता है।
आप जिस दिन कर्म करते हैं, वह किसी के लिए पाठ होता है।
विचलित करके नहीं, उदाहरण से सिखाइए।
देखिए कितनी बार ऐसी शक्तियाँ आपको चलाती हैं जिन्हें आपने चुना नहीं।
चीज़ें कैसे चलती हैं, यह जानना उनकी पकड़ ढीली करता है।
कभी स्वयं उलझे हुए व्यक्ति की विनम्रता से सिखाइए।
किसी अच्छे अभ्यास को ईमानदार प्रयोग का अवसर दीजिए।
जो मन केवल आलोचना करता है, वह कभी अभ्यास नहीं करता।
जिस ज्ञान को आप लागू नहीं करेंगे, वह आधा खो चुका है।
बात के कर्ता बनिए, केवल आलोचक नहीं।
कठोर संयम जहाँ विफल होता है, कोमल जागरूकता वहाँ सफल होती है।
अपने खिंचाव को जानना उसे साधने का आधा भाग है।
आपका अपना काम, अनाड़ी होने पर भी, आपका अपना है।
अपनी विफलताओं के बारे में ईमानदार प्रश्न बदलाव की शुरुआत हैं।
विवेकी अपनी ही लालसाओं को सबसे अच्छी तरह जानते हैं।
छोटे दैनिक संयम बड़ी आंतरिक स्वतंत्रता रचते हैं।
पहले अनुशासन; अंतर्दृष्टि पीछे आती है।
आत्म-विजय इस जानने से आती है कि कौन साध रहा है।
आंतरिक शक्ति आत्मा का शांत अधिकार है।
लगाम अकेले संकल्प-बल के नहीं, विवेक के हाथ में रहे।
इस मार्ग से अनेक पार हुए हैं; तुम भी हो सकते हो।
हिम्मत रखो; हर युग के साधक कर्म करते हुए ही मुक्ति की ओर बढ़े हैं।
ज़रूरतें सरल रखो, कर्म भी सरल हो जाएँगे।
अपने कर्मों को चिंतन की अग्नि से गुज़रने दो।
हर अनुशासित आदत एक छोटा त्याग है जो शुद्ध करता है।
मार्ग को चलकर परखो।
संशय अध्ययन और स्थिर अभ्यास से घिसकर दूर होता है।
इंद्रियों को अपनी वृद्धि की सेवा करने दो, लालसा की नहीं।
अपने अनुशासन को केवल नियंत्रण की ओर नहीं, मुक्ति की ओर लक्षित करो।
काम से कमाए बिना ठहराव की जल्दी मत करो।
अपना सबसे कठिन प्रश्न उसके पास ले जाइए जिस पर आपको भरोसा है।
बिखरा हुआ दिन कल फिर अभ्यास करने का निमंत्रण है।
स्पष्ट दृष्टि वह है जिसे कुछ धुँधला नहीं करता।
बाहर की रोशनियाँ बुझें तो भीतर देखिए।
क्या चाहना है, यह तय करने से पहले याद कीजिए कि आप क्या हैं।
हर दिन से आप क्या लेकर निकलते हैं, इसके प्रति सजग रहिए।
सच्चे प्रयास को स्वच्छ दर्पण चाहिए।
भीतर से आरंभ कीजिए; बाहर की खोज का अर्थ अधिक स्पष्ट होगा।
तेज कभी स्वनिर्मित नहीं होता; वह आगे सौंपा जाता है।
अंतर्दृष्टि पाया हुआ उपहार है, छीना हुआ पुरस्कार नहीं।
बोला गया संशय गुरु के लिए अवसर बन जाता है।
तप दंड नहीं; निखार है।
जो आपको बेहतर बनाता है, उसे मत छोड़िए।
अनुशासन और उदारता मिलकर स्वच्छ हृदय बनाते हैं।
अच्छाई अपेक्षित तालियों के साथ अपनी चमक खो देती है।
निश्चितता अभ्यास से आती है, बहस से नहीं।
कुछ पलायन भेष बदली हुई भूल होते हैं।
कर्तव्य के कठिन भाग में अक्सर उसकी सीख छिपी होती है।
स्पष्ट सोच संशय काटती है, दयालुता नहीं।
स्पष्ट उद्देश्य से किए गए कर्म में संशय घुल जाता है।
साधन मायने रखते हैं, पर उन्हें थामने वाला हाथ अधिक मायने रखता है।
आप जो कुछ करते हैं, वह आपके विचारों, वाणी या हाथों से गुज़रता है।
छोटे कर्मों को देखिए; वे बड़े कर्मों को प्रशिक्षित करते हैं।
‘मैंने सब अकेले किया’ शायद ही कभी पूरा सच होता है।
ज्ञेय गहरा होता है तो ज्ञाता बदलता है।
कारण माँगिए, स्वयं से भी।
हठ बल का वेश धर लेता है।
जानिए आप कैसे सोचते हैं और कैसे डटे रहते हैं।
संकल्प-बल उसी की सेवा करता है जिस ओर बुद्धि उसे निर्देशित करे।
संसार को पढ़ने से पहले चश्मा साफ़ कीजिए।
भ्रम का इलाज संभव है, पर तभी जब आप उसे स्वीकारें।
जो संकल्प डगमगाता नहीं, वह दिखावे से अधिक शांत होता है।
कुछ आदतें जिन्हें हम विश्राम कहते हैं, वस्तुतः पलायन हैं।
अभ्यास प्रयास को आनंद में बदल देता है।
अनुशासन से अर्जित आनंद छीन लेना कठिन है।
उस सुख से बचिए जो आपको सुलाए रखता है।
जो मायने रखता है, उसकी ओर कोमलता से जागिए।
आत्म-करुणा इस स्वीकार से शुरू होती है कि आप प्रवृत्तियों से बने हैं।
मनुष्य होना गढ़ा जाना है; विवेकी होना बदले में गढ़ना है।
जो योग्यता आपको मिली है, उसका सम्मान कीजिए।
तप कठोरता नहीं; आत्म-सम्मान का एक रूप है।
ऋजुता यही है कि एकांत और सार्वजनिक, दोनों में एक-से रहें।
बहादुरी अक्सर मौन होती है, मुखर कम।
अपनी राह पर पहला अनाड़ी कदम भी आपका अपना कदम है।
उस मार्ग पर भरोसा कीजिए जो आपके स्वभाव के अनुकूल हो।
पूर्णतावाद टालमटोल का विनम्र रूप है।
उपदेश नक्शा है; चलना यात्रा।
आत्म-शासन सभी अनुशासन के पीछे की शांत शक्ति है।
जो अभिमान सलाह ठुकराता है, वह अपनी ही हानि की ओर चलता है।
पूछिए कि आपका इनकार आपकी सेवा करता है या केवल आपके अभिमान की।
जागरूकता वह है जिससे आप उस स्वभाव को दिशा देते हैं जिसे मिटा नहीं सकते।
मनन जानकारी को दृढ़ विश्वास में बदल देता है।
देखिए दबाव आने पर आपकी पहली प्रवृत्ति क्या होती है।
स्वयं से पूछिए कि आप अपने सबसे मज़बूत समर्थकों के नाम क्यों ले रहे हैं।
किसी मार्गदर्शक को साथ लेकर दिन में प्रवेश कीजिए।
आँधी से पहले नींव मज़बूत कीजिए।
तैयार व्यक्ति को भी ठहरना पड़ता है।
सबसे अधिक तत्परता के क्षण में अपने मार्गदर्शक की ओर मुड़िए।
अपने मार्गदर्शक से कहिए कि वह आपको वहाँ ले जाए जहाँ आप स्पष्ट देख सकें।
किसी परिस्थिति का सामना उसे देखने से शुरू होता है।
कौन एकत्र हुआ है और क्यों, यह देखना विवेक का भाग है।
कभी-कभी मार्गदर्शक का काम बस आपको केंद्र तक ले जाना होता है।
जो चुनाव आपको अपने ही लोगों से अलग कर दे, वह दूसरी नज़र का पात्र है।
अंतर्दृष्टि केवल लाभ नहीं, ज़िम्मेदारी भी है।
स्पष्ट दृष्टि हमें इनकार करने की स्वतंत्रता देती है।
अतीत एक शांत गुरु है।
पुरानी चेतावनियाँ सुनने योग्य हैं, भले उनका स्रोत अनिश्चित हो।
विनम्रता पश्चाताप के साथ बहुत से अधिक सम्मान के साथ थोड़े को चुन सकती है।
कुछ प्रश्नों का कोई आसान विजेता नहीं होता; विवेक फिर भी उनके साथ बैठता है।
जो वास्तव में श्रेष्ठ है उसे माँगो, भले ही आराम न मिले।
तर्क समाप्त होने के बाद का मौन सीखने की उपजाऊ भूमि हो सकता है।
अपने गतिरोध को विराम दो, और गुरु प्रकट हो सकते हैं।
विवेक की बात करना सरल है; शोक की घड़ी में उसे निभाना नहीं।
तुम अपनी किस प्रतिक्रिया को सबसे अधिक स्थिर करना चाहोगे?
यदि तुम शरीर और आत्मा, दोनों का सम्मान करते, तो आज का दिन कैसे बिताते?
इससे गहरा देखो कि किसने किसके साथ क्या किया।
तुम कौन-सी घिसी हुई आदत छोड़ने को तैयार हो?
तुम जो भी मानो, हानि का सामना गरिमा से करो।
यदि तुम सचमुच मान लो कि सब कुछ समाप्त होता है, तो तुम क्या अलग करोगे?
अदृश्य छोरों पर विलाप कुछ नहीं बदलता; दृश्य मध्य को जीना बदलता है।
अपना विस्मय बनाए रखो; वह झूठी निश्चितता से तुम्हें बचाता है।
विनम्रता वहाँ शुरू होती है जहाँ व्याख्या समाप्त होती है।
आदर्श निमंत्रण की प्रतीक्षा मत करो; कुछ द्वार बिना दस्तक के खुल जाते हैं।
तुम किस अवसर को समस्या कहते रहे हो?
ऐसे जियो कि दूसरे तुम्हारे बारे में जो कथा कहें, वह सच हो।
अपनी निष्ठा की रक्षा वैसे करो जैसे अपने नाम की करते हो।
पहले स्वयं से ईमानदार रहो कि तुम पीछे क्यों हट रहे हो।
जिस मार्ग पर आलोचना चलती है, उस पर चलने से पहले उसके लिए तैयार हो जाओ।
अपमान की चुभन तुम्हें सिखाए कि तुम किसे मूल्यवान मानते हो।
गुरु के शब्द तभी तुम्हारे होते हैं जब तुम उन पर चलते हो।
कर्म करने का नया ढंग एक पुराने मन को मुक्त कर सकता है।
अधूरा आरंभ भी गिना जाता है।
जिस साधना में हर प्रयास गिना जाता है, उसमें तुम असफल नहीं हो सकते।
वह एक चीज़ क्या है जिसकी ओर तुम्हारा मन बार-बार लौटता है?
विवेकी गुरु प्रश्नों को आमंत्रित करते हैं; अलंकृत वाणी उन्हें हतोत्साहित करती है।
तुम्हारे शब्द उससे आते हैं जो तुमने परखा है, या उससे जो तुमने केवल सुना है?
तुम अपने अनुशासन से क्या पाना चाहते हो, और क्या वह पर्याप्त है?
संकल्प को ऐसा मन चाहिए जो भूख से बिखरा न हो।
भ्रम के पार देख लेने पर और सलाह की भूख मिट जाती है।
गुरु उन्हीं प्रश्नों के लिए हैं जिन्हें पूछने का साहस हम जुटा पाते हैं।
सुखद और दुःखद दोनों से एक ही खुली हथेली से मिलने का अभ्यास करो।
परिवर्तन तब पूर्ण होता है जब तुम जो छोड़ चुके हो, उसकी याद आना बंद हो जाए।
विनम्रता के बिना प्रयास पहली तेज़ लहर में बह जाता है।
जो तुम्हें भड़काता है, उससे नज़र हटा लो, इससे पहले कि वह ऐसा बन जाए जिसे तुम मना न कर सको।
स्पष्ट स्मृति अच्छे निर्णय की मौन रक्षक है।
आकर्षण और विकर्षण अब भी तुम्हें कहाँ ले जाते हैं?
तूफ़ान से पहले लंगर डालो, उसके बीच में नहीं।
इंद्रियों को कोमलता से राह दिखाओ, जैसे किसी बच्चे को दिखाते हो।
तुम किस बात के प्रति पूरी तरह जागे हो जिसे दूसरे अनदेखा करते हैं?
तुम अब भी किसे अपना कह रहे हो जिसका बस उपयोग किया जा सकता है?
अपनी उलझन को सटीक नाम दीजिए; आधा उत्तर नाम देने में ही है।
पूछने से पहले अपने प्रश्न को उसके सार तक घटाइए।
क्षण-क्षण, हम चुन रहे हैं कि कैसे कर्म करें।
पाखंड तब शुरू होता है जब हम अपने आचरण के पीछे अपने विचार छिपाते हैं।
आप जो करते हैं, उसे जो सोचते हैं उससे मिलाइए।
बाध्य न होने पर भी कर्म चुनिए।
वही प्रयास स्वार्थी या निःस्वार्थ हो सकता है; चुनिए।
निरंतरता टिप्पणी से अधिक मायने रखती है।
संशय को टालने की आदत मत बनने दीजिए।
स्वभाव बलवान है, इसलिए उसे कोमलता से प्रशिक्षित कीजिए।
किसी प्रवृत्ति को रोकने से पहले उसे दिशा दीजिए।
अपने ही अधूरे मसौदे के लेखक बनिए।
अपना आरंभ-बिंदु अपनाइए, जैसा भी अपूर्ण हो।
हर आदत कभी स्वतंत्र चुनाव जैसी दिखती थी।
वहाँ से आरंभ कीजिए जहाँ आपका नियंत्रण है: जो आप देखते, सुनते और कहते हैं।
आत्म-संयम तपस्या नहीं; वह चश्मा साफ़ करना है।
विनम्रता से ज्ञान ग्रहण करो, ईमानदारी से उसे आगे बढ़ाओ।
अपने छोटे दृष्टिकोण को विनम्रता से थामो; कहानी बहुत पुरानी है।
उनके पदचिह्नों पर चलो जो मुक्त होकर चले।
जो ज्ञान अपने तक रखा जाए, वह आधा ही सीखा गया है।
समय और अभ्यास को अपना धीमा शुद्धिकरण करने दो।
बाहर जाकर प्रतीक्षा करने से अच्छा है कि मैदान में रहकर बढ़ो।
संयम और दया मिलकर स्वच्छ हाथ बनाते हैं।
स्वयं को जानना सबसे उज्ज्वल शिक्षा है।
अहंकार रहित संकल्प केवल बुद्धिमत्ता है।
संतुलित आराम स्थिर साधना को सहारा देता है।
हर शाखा का बढ़ना ज़रूरी नहीं; कुछ की छँटाई ज़रूरी है।
काटना आधी यात्रा है; पहुँचना शेष आधी।
बाकी सब ढीला करते हुए भी लक्ष्य को थामे रखिए।
स्वयं को पवित्र मानिए; पवित्र का एक अंश आप में बसता है।
जो सुन रहा है उसे जानिए, फिर सुनी हुई चीज़ का पीछा कीजिए।
व्यस्तता को खोज मत समझ लीजिए।
मार्ग स्पष्टता में समाप्त होता है, और स्पष्टता इच्छा से शुरू होती है।
साधक को बड़े शब्दों से उलझन हो सकती है, और यह स्वाभाविक है।
किसी वस्तु के प्रकार जान लेने से आप उसके जाल से बच जाते हैं।
स्वच्छ अंतःकरण श्रेयों की लंबी सूची से हल्का होता है।
यह भी देखिए कि कर्म कैसे सिद्ध होते हैं, केवल यह नहीं कि क्या सिद्ध हुआ।
उचित या अनुचित, हर कर्म का एक कारण होता है जिसे खोजा जा सकता है।
अप्रशिक्षित सोच हर चीज़ का श्रेय एक ही कारण को दे देती है।
स्वयं को अति-श्रेय देना और अल्प-श्रेय देना, दोनों भूलें हैं।
जानने, करने और होने के बेहतर और कमतर ढंग होते हैं।
आत्म-जागरूकता अपनी प्रवृत्तियों को वर्गीकृत करने से शुरू होती है।
उन भागों के प्रति जिज्ञासु रहिए जिन्हें आप अभी नहीं देख पाते।
सामर्थ्य अपमान नहीं; सूचना है।
अपने मन का अध्ययन उतनी ही सावधानी से कीजिए जितना अपने लक्ष्यों का।
आत्म-ज्ञान अपने मन की आदतों को छाँटने से शुरू होता है।
अच्छा विवेक शांत और सुसंगत होता है।
वास्तविक बल है स्वयं से किया कोमल वचन निभा पाना।
पूछिए कि कोई सुख कल आपको क्या कीमत चुकवाएगा।
स्वभाव प्रतिभा देता है; अनुशासन उसे दिशा।
कौशल, प्रयास और संकल्प मिलकर विश्वसनीय व्यक्ति बनाते हैं।
संक्षेप में सुनिए; देर तक अभ्यास कीजिए।
सार पूछिए, फिर सार को जिएँ।
अभिमान इसे महँगा बनाए, उससे पहले सहायता माँग लीजिए।
सीखने योग्य बने रहिए; इससे मार्ग खुला रहता है।
आत्म-प्रवंचना अपने स्वभाव के विरुद्ध दुर्बल ढाल है।
जो आपको सबसे अधिक सुनना चाहिए, उसे फिर सुनिए।
दूसरी बार सुनना अक्सर अधिक गहराई तक पहुँचता है।
रणनीति दूसरों में आसानी से दिखती है, अपने में कठिनता से।
स्पष्टता के लिए बोलिए, आश्वासन के लिए नहीं।
जानिए लोग आपके साथ वास्तव में क्यों खड़े हैं।
अपनी तैयारी पर भरोसा कीजिए, अपनी गणना पर नहीं।
महत्वपूर्ण यात्राएँ आशय के स्पष्ट संकेत के साथ आरंभ कीजिए।
उपस्थित रहिए, भले आपकी भूमिका सबसे ऊँची आवाज़ वाली न हो।
शोर पर आपकी प्रतिक्रिया आपकी नींव के बारे में सिखाती है।
संसार से बोलने से पहले अपने अंतर्मार्गदर्शक से बोलिए।
समझने के लिए स्वयं को रखिए, केवल कर्म के लिए नहीं।
ध्यान से देखा गया कार्य बेहतर समझा जाता है।
सबको प्रसन्न करने की चाह बहुतों को भटका सकती है।
मार्गदर्शन वहाँ पहुँचने से शुरू होता है जहाँ आपको होना चाहिए।
अपने गुरु को वह दिखाने दीजिए जो ठीक आपके सामने है।
आपका संयम जितना आप जानते हैं उससे अधिक की रक्षा कर सकता है।
नैतिक ठहराव दुर्बलता नहीं है।
अपनी दृष्टि जाँचे बिना दूसरों के अंधेपन पर निर्णय मत दीजिए।
हानि से मुड़ना एक चुनाव है, पराजय नहीं।
विरासत में मिली चेतावनियों को अपने अंतःकरण से परखिए।
आत्म-सच्चाई असुविधाजनक है, पर रक्षक है।
बदला न लेना पहले एक निर्णय होता है, फिर चरित्र बन जाता है।
हिचकिचाता हुआ विवेक सदा ग़लत विवेक नहीं होता।
जो निश्चितता तुम्हारे पास नहीं है, उसका दिखावा मत करो।
तुम स्वयं को कहाँ सबसे अचल पाते हो? वहीं से शुरू करो।
तुम चाहते हो कि तुम्हारे चुनाव कैसे याद किए जाएँ?
तुम्हारे बारे में किसकी राय खोने से तुम सबसे अधिक डरते हो?
पहले उठो; दिन का अर्थ पीछे-पीछे आएगा।
ध्यान से सुनो: अगला पाठ अंतर्दृष्टि को कुशलता में बदलता है।
कौन-सी अंतर्दृष्टि तुमने अभी तक अभ्यास में नहीं उतारी?
आज तुम कौन-सा छोटा अभ्यास शुरू कर सकते हो जिसे भय मिटा न सके?
अलंकार पहनकर आने वाली निश्चितता से सतर्क रहो।
तुम्हारे ध्यान को तुम्हारे अपने केंद्र से बार-बार कौन खींच ले जाता है?
यदि तुम्हें न कुछ पाना होता और न कुछ बचाना होता, तो तुम क्या करते?
तुम्हारे अध्ययन ने तुम्हें क्या जीने के लिए तैयार किया है?
अपने उकसाने वाले कारणों को पहचानो, इससे पहले कि वे तुम्हें पहचान लें।
तुम्हारे दिन में चिंतन के लिए, पाँच मिनट ही सही, कहाँ जगह है?
यदि तुम बिना योजना के बंदरगाह से निकले थे, तो हवा को दोष मत दो।
कौन-सी एक आदत संयमित हो जाए तो तुम्हारा सबसे अधिक हिस्सा मुक्त हो जाएगा?
केवल यह मत पूछिए ‘मुझे क्या जानना चाहिए?’; पूछिए ‘मुझे क्या करना चाहिए?’
गुरु से कहिए कि उत्तर उतना स्पष्ट हो जितना प्रश्न सच्चा है।
अपनी विधि चुनने से पहले अपना स्वभाव जानिए।
शिक्षा सीखने वाले के अनुरूप ढलती है।
पलायन पाठ को टालता है; उसे रद्द नहीं करता।
सर्वोत्तम अनुशासन सहज अच्छे काम जैसा दिखता है।
देना आपकी आदत बने, अपवाद नहीं।
उन्हें देखिए जो पीछे हटे बिना सफल हुए।
ऐसे व्यवहार कीजिए मानो आपसे सीखा जा रहा हो।
आपका आलस्य भी सिखाता है।
थका नेता भी सिखाता है, इसलिए समझदारी से विश्राम कीजिए और लौटिए।
जो अधिक देखते हैं, उन्हें कम चिल्लाना चाहिए।
नक्शे से बहस करना बंद कीजिए और पहला कदम बढ़ाइए।
चुपचाप अभ्यास कीजिए और परिणामों को बोलने दीजिए।
किसी अच्छे उपदेश को ठुकराना एक उपहार को ठुकराना है।
जिसे समझा नहीं, उससे मत लड़िए।
इंद्रियों के अपने प्रिय होते हैं; आपके होना ज़रूरी नहीं।
अच्छा होना चाहना और अच्छा हो पाना एक नहीं हैं।
हम जो करते हैं, उसके सदा लेखक नहीं होते।
सतह साफ़ कीजिए और सत्य चमक उठता है।
धूल हानि नहीं है; वह केवल धूल है।
अपने तर्क में छिपी इच्छाओं को जाँचिए।
विवेक यह जानना है कि अपने किस भाग पर भरोसा करना है।
अभ्यास रुकते ही विस्मृति शुरू हो जाती है।
आज तुम अपने काम से चुपके से क्या पाना चाहते हो?
जब ज्ञान आत्म-संयम को राह दिखाए, प्रयास भी स्वतंत्रता लगता है।
आज के काम ने तुम्हें क्या सिखाया?
जिसे तुम बदलना सीख सकते हो, उसका दोष आकाश को मत दो।
इच्छा और क्रोध ही असली बाधाएँ हैं; उन्हें पार करो, शांति निकट है।
इतने छोटे जीवन में तुम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो?
विनम्रता तब शुरू होती है जब आप मान लेते हैं कि आपको आश्रय चाहिए।
यदि तुम आज एक काम कम करो तो क्या होगा?
मज़बूत जड़ों को ढीला करने के लिए उससे मज़बूत संकल्प चाहिए।
सही देखना है, जो सबसे ऊँचा दिखता है उससे अधिक देख पाना।
जब सर्वोच्च आपके लिए खुला है, तब छोटे लक्ष्य पर संतोष मत कीजिए।
अध्याय का अंत अभ्यास के एक शांत संकल्प के साथ कीजिए।
इस सप्ताह तुम अपने शरीर के प्रति अधिक दयालु कैसे हो सकते हो?
जब जीवन परिभाषाओं पर टिका हो, तब परिभाषाएँ मायने रखती हैं।
वैराग्य सामने के कार्य पर लगा हुआ ध्यान भी है।
दो मतों को इतनी देर थामिए कि देख सकें वे क्या बचाते हैं।
गुरु की देन स्पष्ट वर्गीकरण भी है।
विवेकी अपनी शुद्ध करने वाली आदतें बनाए रखते हैं।
जो आपको परिष्कृत करता है उसे रखिए; जो केवल सजाता है उसे छोड़िए।
भ्रम में अधूरा छोड़ा गया कार्य स्वयं को अधूरा छोड़ना है।
सात्त्विकता स्थिर होती है, चुनिंदा नहीं।
बुद्धि को पूरी तस्वीर देखने के लिए प्रशिक्षित कीजिए।
आपकी बुद्धि तब स्वच्छ रहती है जब वह सत्य की सेवा करे, छवि की नहीं।
कर्म से पहले प्रेरणा आती है; जानिए वह कहाँ से आई।
जो गुरु प्रकारों की सूची देता है, वह आपके हाथ में दर्पण थमाता है।
देखिए कब आप भेदों को ट्रॉफ़ी की तरह जमा कर रहे हैं।
संकीर्ण समझ का बचाव सरल है, उसमें जीना कठिन।
थकान आपके उद्देश्य को जाँचने का संकेत है।
लापरवाही धीमी गति से होने वाली हानि है।
अच्छे इरादों को अच्छे कर्म बनने के लिए स्पष्ट समझ चाहिए।
ज़िद को अपने प्रति निष्ठा मत समझिए।
दुःख प्रयास से बचने से नहीं, सही प्रयास खोजने से समाप्त होता है।
यदि अच्छा लगने के लिए उसे बार-बार दोहराना पड़े, तो उस प्रतिरूप को पहचानिए।
लापरवाही वह धोखा है जो हम स्वयं को देते हैं।
पूछिए कि आप आराम कर रहे हैं या बच रहे हैं।
कहते हैं देवता भी प्रकृति के गुणों से गढ़े हैं; स्वयं के प्रति कोमल रहिए।
अपनी प्रवृत्तियों को पहचानिए, इससे पहले कि वे आपके लिए निर्णय कर दें।
भीतर का घर साफ़ रखिए, बाहर का जीवन उसके पीछे चलेगा।
पूर्णता एक दिशा है, गंतव्य नहीं।
किसी और की नकल बनने के बजाय अपने ही आरंभिक बनिए।
कुछ भी करने की कीमत को स्वीकार कीजिए।
दृढ़ता स्वच्छ मन को स्वच्छ रखने का ढंग है।
देह, वाणी और मन की रक्षा एक ही घर की तरह कीजिए।
अभिमान को आदत बनने से पहले उतार दीजिए।
सर्वोच्च के योग्य बनने के लिए अनावश्यक को खाली करके आरंभ कीजिए।
विनम्रता विनाश के विरुद्ध सबसे सस्ता बीमा है।
अहं में जड़ा संकल्प भंगुर है; उद्देश्य में जड़ा संकल्प झुककर भी टिकता है।
जब आप स्वयं से मुक्त होने का दिखावा करते हैं, तब आप कम मुक्त होते हैं।
गहरी बातों के साथ समय लीजिए।
जब आप दूसरों की शक्तियाँ गिनें, अपनी भी जोड़ लीजिए।
प्रतिबद्धता का सम्मान उसके योग्य बनकर कीजिए।
देखिए शोर आपसे क्या करवाना चाहता है।
शक्ति अपनी ध्वनि स्वयं बनाती है।
सामने की व्यवस्था को देखना चिंतन का आरंभ है।
अपना सर्वोत्तम रथ सबसे अधिक स्पष्टता के स्थान तक ले जाइए।
अपने जीवन के बड़ों और गुरुओं के सामने खड़ा होना भी एक दर्पण है।
हाथ काँप रहा हो तो साधन अधिक मायने नहीं रखते।
आराम की चाह हमें अपने मूल्यों से बहुत दूर खींच सकती है।
स्वयं की रक्षा कीजिए और फिर भी हानि पहुँचाने से इनकार कीजिए।
अपने दृश्य मौसम का तुम क्या करोगे?
जिस स्थिर व्यक्ति को तुम बनना चाहते हो, उसे उसकी आदतों से देखो, मान्यताओं से नहीं।
किसी उपदेश को तब तक चुनौती देने से मत डरिए जब तक आप उसे समझ न लें।
विकास का कोई एक नुस्खा नहीं है।
अपने दिवास्वप्न देखिए; वे आपकी वास्तविक आसक्तियाँ दिखाते हैं।
अपनी इंद्रियों को अपने उद्देश्य की सेवा करने दीजिए।
निष्क्रियता काम से भारी होती है।
प्रयास प्रेम की अभिव्यक्ति हो सकता है, असुरक्षा की नहीं।
आप क्या सामान्य बना रहे हैं, इसका ध्यान रखिए।
दोष खोजना आसान है; अभ्यास कठिन और अधिक फलदायी है।
इच्छा और कर्म का अंतर अध्ययन का पात्र है।
जो ढकता है उसे हटाइए; जो कमी लगे उसे गढ़िए मत।
एक बार में एक इंद्रिय का भार सँभालिए।
राजा भी कभी श्रोता बनकर ही आगे बढ़े थे।
उलझन को जब गुरु के पास ले जाओ, वह सीख बन जाती है।
अपने व्रत निभाओ, तुम्हारे व्रत तुम्हें निभाएँगे।
साँस को साधो, तो दिन को साधना शुरू हो जाता है।
यदि यह संशय चला जाए, तो आज तुम क्या करोगे?
मिली-जुली सलाह इस बात का संकेत है कि और स्पष्ट प्रश्न पूछो।
विचारशील साधक बेचैन खोजी से जल्दी पहुँचता है।
कर्तापन के दावे के बिना तुम्हारा दिन कैसा लगेगा?
तुम कौन-सी भलाई इस डर से टाल रहे हो कि उसका कोई मोल नहीं होगा?
आज तुम कौन-सा पुराना कौशल या अभ्यास जगा सकते हो?
तुम वर्षों तक क्या अभ्यास करते रहने को तैयार हो?
तुम्हारी कौन-सी मान्यताओं का तुमने सचमुच अनुभव किया है?
तुम अपना अधिकतर ध्यान किसे देते हो, और क्यों?
जिसका तुम पीछा कर रहे हो, क्या वह टिक सकता है?
यदि तुम जानते कि तुम्हें पूरी तरह देखा जा रहा है तो तुम क्या अलग करते?
तुम अंत में अपना मन कैसा चाहोगे, और आज क्या अभ्यास कर सकते हो?
तुम अंत में अपने पीछे कौन-सा अभ्यास चाहोगे?
तुम किसकी ओर चढ़ रहे हो, और क्या वह टिकेगा?
तुम किस चक्र से बाहर निकलने को तैयार हो?
यदि तुम हिसाब न रख रहे होते तो क्या करते?
तुम्हारी कौन-सी आदतें प्रकृति का खिंचाव हैं, और कौन-सी तुम्हारा चुनाव?
आज तुम अपने भीतर के किस दिव्य गुण को पोषित करना चाहोगे?
आज तुम कौन-सा नया संकल्प ले सकते हो?
तुम अपने भीतर कौन-सा गुण सबसे अधिक पोषित करना चाहते हो?
हाल में तुमने अपने बारे में क्या सीखा?
तुम जो शुरू करना चाहते हो, उसका पहला छोटा अक्षर क्या है?
तुमने क्या सुना है जिसे अब स्वयं देखना चाहते हो?
तुम क्या देखना चाहते हो, और क्या तुम तैयार हो?
आज जो समय बचा है, उसका तुम क्या करोगे?
तुम्हारे जीवन में कहाँ बस उठकर शुरू करने का समय है?
अपने ध्यान के सर्वश्रेष्ठ क्षण उसे दीजिए जिसे आप सबसे पवित्र मानते हैं।
अदृश्य को खोजना हो तो बेचैनी छोड़कर स्थिर दृष्टि अपनाइए।
तुम्हें दिए गए क्षेत्र की देखभाल कैसे कर रहे हो?
तुम अपनी प्रकृति के बारे में सबसे अधिक क्या समझना चाहते हो?
तुम इनमें से कौन-सा गुण अपने भीतर बढ़ाना चाहोगे?
तुम्हारी कौन-सी आदतें प्रकृति की हैं, और कौन-सी तुम्हारे चुनाव की?
तुम स्वयं के बारे में क्या और स्पष्ट देखने को तैयार हो?
तुम क्या पीछा कर रहे हो जिसे रुककर देख सकते हो?
तुम जीवन भर कैसा मन अपने साथ ले चलना चाहते हो?
आज तुम इनमें से किस गुण का और अभ्यास करना चाहोगे?
इनमें से कौन-सा गुण अभी तुम में बढ़ रहा है?
इन प्रवृत्तियों में से कौन-सी तुम स्वयं में सबसे अधिक पाते हो?
अपने भीतर के किस अच्छे गुण को तुम अनदेखा करते रहे हो?
जिससे तुम प्रेम करते हो, उसकी ओर वापसी का एक छोटा कदम क्या है?
अपने लिए कौन-सा भला तुम टालते रहे हो?
क्या तुम्हारे जीवन में कोई अनुशासन कठोर हो गया है, और तुम उसे कैसे नरम कर सकते हो?
इस सप्ताह तुम कौन-सी साधना केवल उसी के लिए कर सकते हो?
क्या तुम्हारी कोई साधना कठोर हो गई है? वह कैसे नरम हो सकती है?
इस महीने तुम किस स्थिर भलाई के प्रति प्रतिबद्ध हो सकते हो?
आज तुम अपना और अधिक हृदय कहाँ ला सकते हो?
अठारह अध्यायों के बाद भी सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी प्रश्न पूछते रहते हैं।
सत्य की खोज को व्यवस्थित रखिए।
सुविधा सही होने का मापदंड नहीं है।
विश्राम भी एक प्रकार का कर्म है; उसे भी अच्छी तरह कीजिए।
सही देखना सीखना जीवन भर का अनुशासन है।
अपने साधनों को समझना स्वयं को समझने का हिस्सा है।
मन का वर्गीकरण करने वाली शिक्षाएँ आत्म-ईमानदारी का निमंत्रण हैं।
अपने सुखों को वर्गीकृत कीजिए और आपका जीवन स्पष्ट हो जाएगा।
प्रेम जब ध्यान से जुड़ता है, सीख गहरी हो जाती है।
मन की शुद्धता निरंतर अभ्यास का धीमा उपहार है।
लालसा के बिना तुम्हारी योजनाएँ कैसी दिखतीं?
तुमने कहाँ पद्धति के भेद को लक्ष्य का भेद मान लिया है?
तुम्हारे जीवन में यह प्रयास का मौसम है या ठहराव का?
आज तुम कौन-सी छोटी साधना दोहराओगे?
तुम्हारे दिन का कौन-सा हिस्सा आज असंतुलित है?
यदि तुम्हारा दैनिक अभ्यास सरल हो तो वह कैसा दिखेगा?
तुमने बहुत पहले कौन-सी आदत बनाई जिसके लिए तुम आभारी हो?
तुम कौन-सा भीतरी काम टाल रहे हो?
तुम्हारे जीवन को उसकी चमक क्या देता है?
तुम अपने भीतर किस बीज की देखभाल कर रहे हो?
तुम्हारी कौन-सी चाहतें तुम्हारे मूल्यों के अनुरूप हैं?
जल्दबाज़ी या आदत ने तुम्हारी स्पष्टता को कहाँ धुँधला किया है?
तुम अभी क्या देखने को तैयार नहीं हो, और तुम्हें क्या तैयार करेगा?
तुम पूरे हृदय से किस भलाई के प्रति प्रतिबद्ध हो सकते हो?
कौन-सा योग्य उद्देश्य तुम्हारे अनुशासन को अर्थ देता है?
आज कुछ शांत मिनटों के लिए तुम कौन-से द्वार बंद कर सकते हो?
तुम्हारे लिए सच्चा घर कैसा लगेगा?
आज तुम्हारे जीवन में कौन-सी नई बात उभर रही है?
तुम्हारे लिए पहुँच जाना कैसा लगेगा?
सबसे बड़े संक्रमणों के लिए तैयार महसूस करने में तुम्हें क्या मदद करेगा?
आज तुम्हारे मार्ग में प्रकाश क्या लाता है?
तुम्हारी कौन-सी आदतें उजले मार्ग की हैं?
तुम्हारे जीवन का कौन-सा सत्य सरल है फिर भी अभ्यास में नहीं?
तुम्हारे जीवन में क्या नए आरंभ से पहले विश्राम कर रहा है?
तुम अपनी किन आशाओं को और ध्यान से परखना चाहोगे?
तुम्हारा कौन-सा कठिन मौसम चुपचाप कुछ पोषित कर रहा हो सकता है?
तुम्हारे जीवन का कितना भाग पाने और लौटने में बीतता है?
कौन-सी अच्छी सलाह तुम्हें फिर से सुननी चाहिए?
आज तुम इन गुणों में से किसका अधिक अभ्यास करना चाहोगे?
तुम्हारा कौन-सा विचार तुम्हारे बाद किसी को आकार दे सकता है?
तुम जो मानते हो, उसे किन शिक्षकों ने आकार दिया है?
यदि तुम कुछ भी माँग सकते तो तुम क्या दिखाने को कहते?
तुम किस शिक्षा पर बार-बार लौटते हो, और क्यों?
तुम अपने भीतर कौन-सा पर्वत जैसा गुण बढ़ाना चाहोगे?
आज तुम इन उपहारों में से किसे पोषित करना चाहोगे?
किसके उदाहरण ने तुम्हें दिखाया कि क्या संभव है?
तुम अपने भीतर के किस बीज को बढ़ने में मदद कर रहे हो?
तुम्हारा कौन-सा उपहार किसी बड़े का अंश हो सकता है?
हाल में तुम्हारी कौन-सी उलझन उठी है, और किसने मदद की?
तुमने क्या देखा जिसने तुम्हारे देखने का तरीका बदला?
तुमसे समझ के किस किनारे पर विश्राम करने को कहा जा रहा है?
तुमने किस साधना को कुछ कमाने का तरीका बना लिया है?
तुम जीवन के कौन-से बड़े प्रश्न लेकर चल रहे हो?
किस शिक्षक या ग्रंथ ने तुमसे सबसे स्पष्ट बात की है?
तुम अपनी बनावट का कौन-सा भाग सबसे कम समझते हो?
किस कठिनाई ने तुम्हें सबसे अधिक सिखाया?
तुम क्या अध्ययन कर रहे हो, और किस उद्देश्य से?
तैयार महसूस करने के लिए तुम्हें सबसे अधिक क्या समझना है?
तुम अधिक बार कर्ता होते हो या अनुभव करने वाले?
तुम अपने जीवन के किस ढर्रे को स्पष्ट देखना चाहोगे?
अभी तुम्हारे लिए स्वयं तक पहुँचने का कौन-सा मार्ग सबसे उपयुक्त है?
तुमने सुनकर क्या सीखा है जो अब तुम्हें प्रिय है?
आज तुम्हारे क्षेत्र के किस भाग को और प्रकाश चाहिए?
तुम्हें कौन-सी शिक्षा सबसे अधिक फिर से सुननी चाहिए?
तुम संसार की मिट्टी में क्या उगाने में मदद कर रहे हो?
तुम्हारा 'अच्छा' या 'विवेकी' होने का प्रेम तुम्हें कहाँ बाँध रहा है?
तुम बिना ध्यान दिए कैसी गति बना रहे हो?
थोड़ी दूरी से तुम अपने ढर्रों के बारे में क्या देख सकते हो?
तुम अपने परिवार या जीवन के किस चक्र को समाप्त करने को तैयार हो?
थोड़ा मार्गदर्शन तुम्हारे आवेगों को कहाँ स्थिर कर सकता है?
तुम सबसे अधिक किसकी प्रशंसा करते हो, और वह तुममें क्या उभारता है?
तुम्हारी रोज़ की आदतें तुम्हारी प्रकृति के बारे में क्या कहती हैं?
तुम अपने अगले भोजन में देखभाल का कौन-सा छोटा कर्म ला सकते हो?
तुम्हारी कौन-सी आदत ने अपना हृदय खो दिया है, और तुम उसे कैसे पुनर्जीवित कर सकते हो?
शरीर की कौन-सी छोटी आदत अधिक दयालुता व्यक्त कर सकती है?
तुम मुख्यतः प्रशंसा पाने के लिए क्या कर रहे हो?
तुम अपने महत्वपूर्ण कार्य को कैसे शुरू करना पसंद करते हो?
तुमने हाल में कौन-सा भला और सच्चा काम किया?
सुनना सीखने का आधा भाग है।
जो संकल्प सुख के पीछे भागता है, वह जल्दी ऊब जाता है।
अपनी सर्वोत्तम सीखों को लौटकर दोहराओ, इससे पहले कि वे चुपचाप छूट जाएँ।
अपनी प्रकृति के स्वामी बनो, फिर संसार तुम्हें बाँध नहीं सकता।
विनम्रता वहाँ से शुरू होती है जहाँ हम मानते हैं कि ज्ञानी को भी सीखना है।
गहरे मार्ग पर हड़बड़ी मत करो।
आत्म-संयम एक शांत अग्नि है जो हृदय को ऊष्मा देती है।
कौन-सा पुराना ढर्रा समझ की अग्नि में जलने को तैयार है?
कौन-सा संशय आज कट जाए तो तुम्हारा काम हल्का हो जाए?
तुम कहाँ दो अच्छी बातों को शत्रु मान रहे हो?
आज के काम ने तुम्हें कैसे निखारा?
तुम्हारे दिन में कहाँ तुम 'प्रभारी' होने से विश्राम ले सकते हो?
तुम बाहर किसे दोष दे रहे हो जिसे भीतर देख सकते हो?
तुम कहाँ अति तक धकेलते रहे हो?
तुम्हारे पिछले प्रयास ने कौन-सी शुरुआतें पहले ही तैयार कर दी हैं?
तुम ज्ञान को दैनिक अभ्यास में कहाँ बदल सकते हो?
सीखना शुरू करते समय तुम्हारा मन किससे जुड़ा है?
आज तुम्हारी प्रकृति के किस तत्व को अधिक देखभाल चाहिए?
जीवन के कौन-से बड़े शब्दों को तुम बेहतर समझना चाहते हो?
तुम कौन-सा गुप्त विवेक चुपचाप लिए चल रहे हो?
तुम्हें किसने सिखाया, और तुम किसे सिखाओगे?
आज तुम्हारे ध्यान के योग्य क्या है, और क्या नहीं?
कौन-सी आदत अर्पित करके तुम अपना जीवन हल्का कर सकते हो?
तुम किसकी सेवा करके उनसे सीख सकते हो?
यदि तुम मान लो कि पार कर सकते हो, तो क्या पार करोगे?
तुम्हारा दैनिक काम तुम्हें पहले से कहाँ प्रशिक्षित कर रहा है?
आज तुम कहाँ कमल-पत्र जैसे हो सकते हो?
कौन-सा प्रश्न, यदि हल हो जाए, तुम्हारा जीवन आलोकित कर देगा?
आज तुम्हारा मन और हृदय किसमें सबसे अधिक डूबा है?
आज तुम कौन-सी स्वार्थी योजना छोड़ सकते हो?
तुम अपने लिए शांत आसन कहाँ बना सकते हो?
तुम्हारी कौन-सी पद्धति को सुधार की ज़रूरत है?
आज तुम क्या पूछने का साहस करोगे?
देखो कि तुम्हारे जीवन में क्या सँवारने योग्य है।
अपने काम में तुम किसके पदचिह्नों पर चल रहे हो?
तुम्हारा कौन-सा कर्म दूसरी, गहरी दृष्टि का हकदार है?
हर सच्ची साधना कुछ ऊपर अर्पित करती है।
तुम्हारी समझ चुपचाप कैसे पक रही है?
तुम्हारे भीतर श्रद्धा और अनुशासन को कहाँ मजबूत करना है?
तुम्हारे किस मार्ग को आज स्पष्ट उत्तर की ज़रूरत है?
कौन-सी साधना तुम्हारे लिए छोड़ना आसान कर देगी?
आज तुम्हारा आंतरिक प्रकाश किससे बना है?
आज तुम अपने मन को किस पर समेटोगे?
एक पुरानी सीख को अपने रोज़ के जीवन में जीवित रखो।
आज तुम किस भाव से आगे बढ़ रहे हो?
तुम अपने जीवन में किसे कर्म कह रहे हो?
गीता में कहाँ
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